- जिन्हें लड़ना था, वे देखते रहे, जिन्हें लड़ना नहीं था,वे अदालत पहुँचे…
- महाविद्यालय की जमीन पर निर्माण और जिम्मेदारों की चुप्पी…
- हाईकोर्ट ने कॉलेज भूमि विवाद पर जनहित याचिका खारिज की,सुरक्षा राशि भी जब्त…

-रवि सिंह-
कोरिया,13 नवंबर 2025 (घटती-घटना)। जमीन थोड़ी थी पर भविष्य बड़ा था…मगर जिस महाविद्यालय को अपनी भूमि बचाने के लिए स्वयं आगे खड़ा होना चाहिए था, वही अपनी आंखों के सामने उस पर कब्जा होता देख मूक दर्शक बन गया, यह सवाल अब जिले में शिक्षा जगत और समाज के बीच गंभीर चर्चा का विषय बन गया है, शासकीय रामानुज प्रताप सिंहदेव महाविद्यालय,जो पिछले 46 वर्षों से कोरिया जिले का अग्रणी उच्च शिक्षा केंद्र रहा है, आज अपनी ही भूमि के एक हिस्से पर दूसरे विभाग का निर्माण होते देख रहा है। यह वही भूमि है,जो आगे चलकर शिक्षा का हब बन सकती थी,लेकिन इसे पुलिस विभाग को आवंटित कर दिया गया वह भी कॉलेज से किसी तरह की स्पष्ट अनापत्ति लिए बिना। कुछ दिनों तक विरोध हुआ, आवाज उठीं,लेकिन समय के साथ विरोध शांत हो गया,जो विरोध करना चाहिए था, जो याचिका दायर करनी चाहिए थी वह महाविद्यालय ने नहीं किया। समाज का एक संगठन आगे आया,जनहित याचिका दायर की, पर उसे भी न्याय नहीं मिला।
बता दे की जिन्हें अपने महाविद्यालय की जमीन बचाने के लिए न्यायालय जाना चाहिए था,वे अपनी ही जमीन पर कब्जा होते देखते रहे क्योंकि उनकी ज़मीन अपनी नहीं है,नुकसान उनके भविष्य का नहीं है! मर्दों के शहर में एक समाजसेवी संस्था छात्रों के हित में,शिक्षा के भविष्य की रक्षा के लिए अदालत पहुंची,लेकिन न्याय नहीं मिला, हाईकोर्ट ने जनहित याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि इसमें आपका कोई हित नहीं है। साथ ही जमानत राशि भी जब्त कर ली, महाविद्यालय परिसर से लगी वह जमीन, जिसे शिक्षा का हब बनाया जा सकता था, जिस पर नए विभाग, नई प्रयोगशालाएं, ऑडिटोरियम और विस्तार योजनाएँ बन सकती थी, उसे अब पुलिस विभाग को दे दिया गया है। और सबसे दुखद वह भी बिना महाविद्यालय से अनापत्ति लिए,निर्माण तेजी से शुरू हो चुका है, कुछ दिनों तक विरोध हुआ, नारे लगे, राजनीतिक बयानबाज़ी भी हुई फिर सब शांत हो गया।अब सभी ने विरोध खत्म कर दिया और बात अब आई गई हो गई।

यहाँ सबसे कड़वा सच यही है…
जिस महाविद्यालय को अपनी जमीन बचाने के लिए आगे आना चाहिए था, वह पूरे प्रकरण में मूक दर्शक बना रहा,हज़ारों छात्रों वाला यह महाविद्यालय चुप क्यों रहा? क्या जिम्मेदारों को अपनी ही जमीन की जानकारी नहीं थी? या फिर उनके ऊपर किसी का दबाव था? या फिर उन्हें इस बात से फर्क ही नहीं पड़ता कि भविष्य में छात्रों के लिए सुविधा बचेगी या नहीं। राजनीति के लिए मुद्दा मिल गया,विरोध को मंच मिल गया, बैठकों को बहस मिल गई पर महाविद्यालय को नहीं मिला, अपनी जमीन बचाने का साहस। और अंत में, एक संस्था जो सच में छात्रों के भविष्य की चिंता कर रही थी, वह अदालत गई, लेकिन हित के नाम पर रोक दी गई।

क्या राजस्व विभाग को 2017 का नजरी नक्शा नहीं दिखा?
खसरा नंबर 288 पर महाविद्यालय स्थापित होने के दस्तावेज सामने आए, फिर उसी जमीन को एसपी ऑफिस के लिए कैसे दे दिया गया? प्रशासन की जिद, प्राचार्य की चुप्पी और महाविद्यालय की जमीन पर तेज़ी से बढ़ता कब्जाज्सवालों के घेरे में पूरा तंत्र कोरिया जिले का चर्चित महाविद्यालय भूमि विवाद अब और भी उलझ गया है। जहां जिला प्रशासन यह दावा करता रहा है कि खसरा नंबर 288 महाविद्यालय की जमीन नहीं है, वहीं दैनिक घटती-घटना के हाथ 2017 का आधिकारिक नजरी नक्शा लगा है, जिसमें साफ-साफ दर्ज है खसरा नंबर 288 महाविद्यालय भवन खसरा नंबर 289 महाविद्यालय का खेल मैदान यानी 2017 में राजस्व विभाग स्वयं यह मान चुका था कि यह भूमि महाविद्यालय की है, तो फिर सवाल बड़ा है 2017 में महाविद्यालय की जमीन, 2025 आते-आते एसपी ऑफिस की जमीन कैसे बन गई?

हाईकोर्ट ने जनहित याचिका खारिज की,कहा यह जनहित नहीं
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की खंडपीठ मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु ने डब्ल्यू.पी.पी.आई.एल 91/2025 को खारिज करते हुए कहा कि: यह याचिका जनहित प्रतीत नहीं होती याचिकाकर्ता इस मामले में अधिकृत पक्ष नहीं हैं स्वयं कॉलेज ने कभी आपत्ति दर्ज नहीं की,विभागीय प्रक्रियाएँ और एनओसी लेकर ही 0.500 हेक्टेयर भूमि पुलिस विभाग को दी गई इसके साथ ही कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का हवाला देते हुए पीआईएल के दुरुपयोग पर सख्त टिप्पणी की और याचिकाकर्ताओं की जमा सुरक्षा राशि जब्त करने का आदेश दिया। क्या यह मामला जनहित नहीं था? सबसे बड़ा सवाल, अगर शिक्षा और छात्रों का भविष्य जनहित नहीं, तो फिर क्या है? हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता अधिकृत पक्ष नहीं हैं कॉलेज स्वयं याचिकाकर्ता नहीं है इसलिए यह जनहित नहीं,बल्कि व्यक्तिगत याचिका प्रतीत होती है

क्या राजस्व विभाग नौसिखियों के भरोसे चल रहा है?
जमीन के रिकॉर्ड,नजरी नक्शे,कब्जे की वास्तविक स्थिति,स्कूल-कॉलेज का अस्तित्व सब कुछ नजरअंदाज कर दिया गया। लोग सवाल उठा रहे हैं, क्या नौसिखिए राजस्व अधिकारियों ने बिना जमीन देखे ही आवंटन आदेश बना दिया? या फिर जानबूझकर ही महाविद्यालय की मौजूदगी को आदेश से छुपाया गया? जो भी हो,यह मामला नियमों,प्रक्रिया और प्रशासन की पारदर्शिता पर गंभीर पर्दा डालता है।
महाविद्यालय की जमीन पर निर्माण,प्राचार्य और प्रबंधन गहरी नींद में?
जहां जमीन बचाने में महाविद्यालय की सबसे ज्यादा रुचि होनी चाहिए थी, वही प्राचार्य और प्रबंधन पूरी तरह मौन हैं, 46 साल पुराने महाविद्यालय की जमीन की सीमा कहां है, क्या प्राचार्य को भी नहीं पता? महाविद्यालय की जमीन पर कक्षा भवन, खेल मैदान, पेड़–पौधे, पुरानी बिल्डिंग, सब मौजूद हैं, फिर भी कोई आपत्ति क्यों नहीं?
याचिकाकर्ताओं का दावा,कॉलेज की भविष्य की जमीन छीनी गई
कोरिया जन सहयोग समिति के अध्यक्ष पुष्पेंद्र राजवाड़े और उपाध्यक्ष जयचंद्र सोनपाकर ने आरोप लगाया था महाविद्यालय की अलॉटेड भूमि में से 0.500 हेक्टेयर जमीन को 31 जुलाई 2025 को कलेक्टर द्वारा पुलिस अधीक्षक कार्यालय निर्माण हेतु पुनः आवंटित कर दिया गया,यह भूमि कॉलेज विस्तार योजना और भविष्य की सुविधाओं के लिए महत्वपूर्ण थी, लेकिन अदालत ने इन्हें अधिकृत पक्ष न मानते हुए कहा कि कॉलेज की ओर से किसी भी चरण में आपत्ति नहीं आई।
सरकार का पक्ष,अभी भी सरकारी रिकॉर्ड में है…
राज्य सरकार की ओर से बताया गया जमीन सरकारी भूमि है,कॉलेज को केवल प्रस्तावित आवंटन था उसके राजस्व रिकॉर्ड और अंतिम प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी एसपी ऑफिस बनाने हेतु जमीन विभागीय एनओसी के बाद विधिवत दी गई इससे कॉलेज के संचालन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
सबसे बड़ा सवाल: महाविद्यालय क्यों चुप रहा?
यह विवाद अब एक बड़े और कड़वे सवाल पर आकर अटक गया है जब जमीन महाविद्यालय की थी,जब दस्तावेज और तथ्य कॉलेज के पास थे,जब भविष्य की शिक्षा और विस्तार का प्रश्न था तो महाविद्यालय प्रबंधन स्वयं क्यों नहीं खड़ा हुआ? क्या जिम्मेदारों पर कोई दबाव था? क्या उन्हें अपनी जमीन से अधिक अपना पद सुरक्षित रखना था? या फिर “उनका तो कोई नुकसान नहीं हो रहा इसलिए वे चुप बैठे रहे? पूर्व और वर्तमान दोनों ही प्रबंधन अब आलोचनाओं के घेरे में हैं क्योंकि 26 वर्षों तक महाविद्यालय से जुड़े रहे अधिकारी भी इस जमीन को बचाने में निष्कि्रय दर्शक माने जा रहे हैं।
महाविद्यालय के भू-भाग पर और भी कब्जे,प्रबंधन मौन
दैनिक घटती-घटना की ग्राउंड जांच में सामने आय,महाविद्यालय की जमीन पर गैर-शासकीय निर्माण कुछ हिस्सों पर स्थायी कब्जे एक बड़े हिस्से पर धार्मिक पंडाल का निर्माण कार्य जारी है,जबकि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ही धार्मिक उद्देश्यों से सरकारी भूमि के उपयोग को गैरकानूनी मानते हैं पर यहां प्राचार्य मौन,डीईओ मौन,जिला प्रशासन मौन क्या यह मौन अनुमति से कम है?
सीमांकन हो जाए,तो कई चेहरे बेनकाब होंगे…
स्थानीय सूत्रों का दावा है यदि एक बार सीमांकन करा दिया जाए,तो महाविद्यालय की जमीन पर कब्जा करने वालों की लंबी सूची सामने आ जाएगी। तो क्या यही वजह है कि प्रशासन सीमांकन कराने से बच रहा है?
सबसे बड़ा सवाल, जनप्रतिनिधि चुप क्यों?
सभी जानते हैं महाविद्यालय की जमीन कम हो जाएगी भविष्य में कक्षाओं,ऑडिटोरियम,प्रयोगशालाओं की जरूरत पड़ेगी,एसपी ऑफिस महाविद्यालय परिसर में बना तो छात्रों की स्वतंत्रता बाधित होगी फिर भी जनप्रतिनिधि चुप हैं,क्यों?
महाविद्यालय के इतिहास में छिपा सच—यह जमीन पहले से ही महाविद्यालय को देने की प्रक्रिया में थी… 05 सितंबर 1982: महाविद्यालय की स्थापना
1986-87 महाविद्यालय के नाम पर भूमि स्थानांतरित करने की प्रक्रिया शुरू
1995-99 महाविद्यालय का संचालन इन भवनों में जारी
पुराने भवन की कई बार मरम्मत महाविद्यालय निधि से
यह भवन महाविद्यालय की परिसंपत्ति के रूप में उपयोग में आता रहा तो फिर ऐसी जमीन को आज एसपी ऑफिस बनाने के लिए कैसे दे दिया गया?
क्या प्रशासन की मजबूरी थी या जिद?
• छात्र संगठनों (एबीवीपी सहित) ने विरोध किया
• महाविद्यालय प्रबंधन ने आपत्ति दी
• विपक्ष ने मुद्दा उठाया
• सामाजिक संगठनों ने भी कहा कि यह गलत है
• यहां तक कि पूर्व मुख्यमंत्री और क्षेत्रीय सांसद ने भी आपत्ति की फिर भी जिला प्रशासन— “फैसला नहीं बदलेगा” के रुख पर अड़ा रहा, तो क्या यह जिद थी या मजबूरी?
निष्कर्ष…
2017 के नक्शे ने खेल बिगाड़ दिया है…अब जब 2017 का नजरी नक्शा सामने है,तो यह स्पष्ट है…महाविद्यालय 288 और 289 पर ही है यह तथ्य प्रशासन से छिपाया नहीं जा सकता आवंटन आदेश में महाविद्यालय की मौजूदगी का उल्लेख न होना संदेह पैदा करता है प्रशासन की जिद,प्राचार्य की चुप्पी और जनप्रतिनिधियों की मौन स्वीकृति इन सबके बीच सबसे बड़ा नुकसान शिक्षा और छात्रों का हो रहा है।
अब स्थिति…
पुलिस अधीक्षक कार्यालय का निर्माण तेज गति से जारी है, समाज सेवी संस्था जिसने पीआईएल दायर की थी,अब निराश होकर पीछे हट चुकी है, और महाविद्यालय? अपनी ही भूमि पर निर्माण को चुपचाप होते हुए देख रहा है,आने वाले वर्षों में इस निर्णय का असर कॉलेज की विस्तार योजनाओं पर कितना पड़ेगा,यह समय बताएगा। लेकिन आज का सवाल—क्या सच में शिक्षा,जमीन से कम महत्वपूर्ण थी? जवाब अभी भी हवा में झूल रहा है।
अंत में यह दो सवाल….
क्या संस्था अपने निजी लाभ के लिए गई थी?
या फिर महाविद्यालय की जमीन और आने वाली पीढि़यों की शिक्षा बचाने के लिए?
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