Breaking News

रायपुर/कोरिया/एमसीबी@राज्योत्सवः जनता का पर्व या सत्ता का आयोजन?

Share

घटती-घटना विशेष रिपोर्ट

  • सरकारी खजाने से करोड़ों खर्च, फिर भी वसूली क्यों? खाली कुर्सियों ने उत्सव की चमक फीकी की
  • कोरिया की जनता करती रह गई इंतज़ार,राज्योत्सव में नहीं पहुंचे पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल
  • रजत जयंती वर्ष के आयोजन में प्रशासन की तैयारी धरी की धरी रह गई…

-रवि सिंह-
रायपुर/कोरिया/एमसीबी,05 नवंबर 2025 (घटती-घटना)।
छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना को 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं, रजत जयंती वर्ष के अवसर पर इस बार राज्य स्थापना दिवस को अभूतपूर्व पैमाने पर मनाया गया। राजधानी रायपुर से लेकर हर जिले में पांच दिवसीय राज्योत्सव के तहत आयोजन हुए, मंच सजे, झांकियाँ निकलीं, कलाकार बुलाए गए और सरकारी विभागों ने अपनी उपलब्धियों की झलकियां पेश कीं, लेकिन अब सवाल उठ रहा है, क्या यह उत्सव वास्तव में जनता का था या फिर सत्ताधारी वर्ग और प्रशासन के लिए एक दिखावा मात्र बन गया? छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित रजत जयंती वर्ष का जिला स्तरीय उत्सव इस बार फीका पड़ गया,जिले में तीन दिवसीय कार्यक्रम की तैयारियां पूरी भव्यता से की गई थीं, परंतु पर्यटन मंत्री एवं मुख्य अतिथि राजेश अग्रवाल के नहीं पहुंचने से कार्यक्रम की चमक फीकी पड़ गई, मंत्री अग्रवाल के नाम की घोषणा मुख्य अतिथि के रूप में की गई थी, जिसके चलते जिले की जनता उनका इंतज़ार करती रही, न तो वे उद्घाटन समारोह में पहुंचे और न ही समापन कार्यक्रम में, इसके विपरीत पड़ोसी जिले मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (एमसीबी) में आयोजित समापन कार्यक्रम में स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल और पूर्व केंद्रीय मंत्री रेणुका सिंह उपस्थित रहीं, जिससे वहां के आयोजन की गरिमा बनी रही।
प्रशासन की तैयारियां रहीं अधूरी
कोरिया जिला प्रशासन,कलेक्टर श्रीमती चंदन त्रिपाठी के नेतृत्व में राज्योत्सव की तैयारियों में जुटा था। सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रदर्शनी स्टॉल और शासन की योजनाओं की जानकारी के साथ आम नागरिकों और जनप्रतिनिधियों की सहभागिता भी रही,लेकिन मुख्य अतिथि के नहीं आने से कार्यक्रम की अपेक्षित चमक नज़र नहीं आई, नागरिकों का कहना था कि “यदि मंत्री को आना नहीं था तो अतिथि सूची से नाम हटवा लिया जाना चाहिए था।”
चर्चा में रहा मंत्री का नहीं आना
सूत्रों के अनुसार,पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल बिहार चुनाव में व्यस्त हैं। हालांकि, राज्योत्सव से एक दिन पूर्व वे रायपुर के एक कार्यक्रम में उपस्थित थे, इससे नागरिकों में यह सवाल उठ रहा है कि यदि मंत्री की ड्यूटी बिहार चुनाव में लगी थी,तो क्या प्रशासन या विभाग को पहले से मुख्य अतिथि का नाम बदल नहीं देना चाहिए था? स्थानीय जनप्रतिनिधि, जिला पंचायत अध्यक्ष, नगर पंचायत प्रमुख, और विधायक, ने कार्यक्रम में शामिल होकर आयोजन की गरिमा बनाए रखी, लेकिन मंत्री की अनुपस्थिति पूरे आयोजन की चर्चा का विषय बनी रही।
प्रदेश में बाकी जिलों में दिखी रौनक
प्रदेश भर में राज्य स्थापना दिवस का रजत जयंती वर्ष उल्लासपूर्वक मनाया गया। हर जिले में मंत्रीगण और विशेष अतिथि उद्घाटन या समापन समारोह में शामिल हुए, परंतु कोरिया जिला ऐसा एकमात्र जिला रहा जहां मुख्य अतिथि के नहीं आने से उत्सव अधूरा रह गया।
सरकारी खर्च फिर भी वसूली, क्यों?
राज्योत्सव पूरी तरह सरकारी आयोजन है,इसके बावजूद कई स्थानों से शिकायतें आईं कि विभागों और कर्मचारियों से अतिरिक्त वसूली की गई, कुछ अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सांस्कृतिक मंच,सजावट और झांकियों के नाम पर अनावश्यक राशि एकत्र की गई, जनता और मीडिया के बीच यह सवाल गूंजता रहा जब आयोजन सरकारी फंड से होता है, तो फिर अधिकारियों और कर्मचारियों से धन क्यों माँगा गया?” प्रत्येक विभाग से अलग अलग राशि मांगी गई और उस राशि का उपयोग कहां किया गया इसका पता नहीं चल सका क्योंकि आयोजन के लिए तो राज्य सरकार से राशि प्राप्त हुई थी,
भव्य मंच,भारी खर्च…पर जनता कहाँ थी?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष राज्योत्सव आयोजन पर करोड़ों रुपये खर्च हुए। बावजूद इसके कई जिलों में कार्यक्रम स्थलों पर खाली कुर्सियाँ नजर आईं, जहाँ लोकनृत्य और पारंपरिक प्रदर्शन देखने की उम्मीद थी, वहाँ राजनीतिक भाषण और औपचारिक उपस्थिति प्रमुख रही। कई जिलों में मुख्य अतिथि निर्धारित समय पर पहुँचे ही नहीं, जिससे कार्यक्रम का जोश फीका पड़ गया।कई जगह मुख्य अतिथि पहुंचने से भी परहेज किए,कुल मिलाकर आयोजन केवल औपचारिकता पूर्ण करने वाली नजर आई और जिसमें वसूली मुख्य उद्देश्य रहा और अंत में पीठ अपनी खुद थपथपाकर अधिकारियों ने इसे सफल आयोजन घोषित कर दिया।
स्थापना दिवस की तिथि पर भी उठे सवाल
1 नवंबर, जो राज्य स्थापना दिवस का मूल दिन है, उस दिन राज्य स्तर पर छुट्टी होने के बावजूद अधिकांश जिलों में कोई बड़ा आयोजन नहीं हुआ, कार्यक्रम 2 नवंबर से शुरू हुए और 4 नवंबर को समाप्त हो गए, जबकि रायपुर में यह उत्सव 5 नवंबर तक चला, इस विचित्र कार्यक्रम संरचना पर नागरिकों का कहना था कि “जब जनता घर पर थी, उस दिन कोई बड़ा आयोजन नहीं हुआ। जो दिन ऐतिहासिक था, वही सबसे शांत दिवस क्यों रहा?” जिला स्तरीय आयोजन 2 नवंबर से आयोजित किया गया जो एक दिन पूर्व के घोषित अवकाश से एक दिन बाद का दिन था।
संस्कृति की जगह सत्ता का प्रदर्शन
छत्तीसगढ़ महतारी की संस्कृति,परंपरा और लोक कला की झलक दिखाने के बजाय मंचों पर सत्ता पक्ष के प्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी छाए रहे, स्थानीय लोक कलाकारों को मंच का सीमित अवसर मिला, जबकि बाहरी समूहों को प्राथमिकता दी गई, छत्तीसगढ़ की मिट्टी,बोली, नृत्य और लोक परंपरा, जिनके लिए यह दिवस समर्पित होना चाहिए था, वे पृष्ठभूमि में रह गईं।
जनता की अनुपस्थिति, आयोजनों की सच्चाई
राजधानी से लेकर अंचल तक कई स्थानों पर कार्यक्रम स्थलों पर दर्शकों का अभाव दिखा,कुर्सियाँ खाली रहीं,उत्सव की चमक फीकी पड़ी,लोगों ने सोशल मीडिया पर भी अपनी नाराज़गी व्यक्त की,राज्योत्सव की खबरें अख़बारों और टीवी पर जरूर दिखीं,लेकिन हमारे मोहल्ले तक उसका उत्साह नहीं पहुँचा। वैसे अंतिम दिवस लोगों ने आयोजन स्थल का रुख किया लेकिन वहां सत्ता और प्रशासन की आपसी उत्साह को देखकर उन्होंने यही महसूस किया कि आयोजन पूर्णतः सत्ता और प्रशासन का ही रहा इससे आम लोगों का जुड़ाव कम इसीलिए रहा।
जनता के बीच यह चर्चा आम,”उत्सव किसका है”?
लोगों का कहना है कि राज्य स्थापना दिवस वास्तव में जनता का पर्व होना चाहिए था,न कि सिर्फ सत्ता और प्रशासन का कार्यक्रम, सरकारी फंड से हो रहे इन आयोजनों में अगर जनता की भागीदारी ही न दिखे, तो सवाल उठना लाजिमी है, जिस उत्सव में जनता दर्शक बन जाए, वह जनपर्व कैसे कहलाए? आयोजन के दौरान सत्ता और प्रशासन ही ज्यादा उत्साहित नजर आया,सत्ता और प्रशासन के लिए यह आयोजन पारिवारिक आयोजन की तरह रहा जहां उन्होंने जमकर उत्साह प्रदर्शन अपना किया।
छत्तीसगढ़ की पहचान जनता से है,न कि आयोजनों से…
राज्य का 25वां स्थापना वर्ष आत्ममंथन का अवसर था, छत्तीसगढ़ की परंपराओं, संघर्षों, मेहनतकश जनता और संस्कृति को सम्मान देने का समय, परंतु करोड़ों के खर्च और मंचीय भव्यता के बीच जनसंवेदना कहीं खो गई। जनता की बजाए आमंत्रण सत्ता और प्रशासन के बीच बंटा,जिलाधीश का सोशल मीडिया आह्वान भी कई जिलों में सरकारी आह्वान बनकर रह गया और जनसंपर्क भी अप्रभावी नजर आया।
निष्कर्ष,जनभागीदारी ही होगी सच्ची रजत जयंती
राज्योत्सव तभी सार्थक होगा,जब यह सत्ता का नहीं, जनता का उत्सव बने, जब मंचों पर भाषणों की जगह लोकगीत गूंजें,और जनता खुद उसकी आत्मा बने,क्योंकि,छत्तीसगढ़ की असली पहचान उसकी मिट्टी,उसकी भाषा और उसके लोग हैं,न कि भव्य पंडाल और सरकारी सजावट।
सरकार ने ऐसे मुख्य अतिथि क्यों बनाए जो आयोजन में पहुंच ही नहीं पाए?
राज्योत्सव आयोजन में सरकार ने प्रत्येक जिले के लिए मुख्य अतिथियों की नियुक्ति की,यह मंत्री, सांसद,विधायक और कई निगम आयोग के अध्यक्ष थे,कई जगह मुख्य अतिथियों ने पहुंचना ही मुनासिब नहीं समझा,कोरिया जिले के मुख्य अतिथि तीन दिवसीय आयोजन में एक दिन भी नजर नहीं आए,जिला प्रशासन को अंत में स्थानीय विधायक से ही आयोजन का शुभारंभ कराना पड़ा,वहीं एमसीबी जिले में मुख्य अतिथि ने अंतिम दिवस पहुंचना मुनासिब समझा आयोजन के शुभारंभ से उन्होंने भी दूरी ही बनाई,अब सवाल यह है कि जब आयोजनों को लेकर मुख्य अतिथि बनाए गए जनप्रतिनिधि ही गंभीर नहीं थे ऐसे मुख्य अतिथि सरकार ने बनाए ही क्यों।
एमसीबी जिले में मुख्य अतिथि पहुंची अंतिम दिवस,शुभारंभ कार्यक्रम से उन्होंने बनाई दूरी
एमसीबी जिले में मुख्य अतिथि बनाई गईं भरतपुर सोनहत विधायक शुभारंभ कार्यक्रम से दूरी बनाती नजर आईं,उन्होंने अंतिम दिवस पहुंचकर समापन कार्यक्रम में हिस्सा लिया,एमसीबी जिले के समापन कार्यक्रम में मंच से ऐसा भी कुछ हुआ जो राज्य उत्सव और सरकार की उपलब्धियों के बखान की बजाए व्यवस्था की आलोचना थी,आलोचना भले ही हास्य व्यंग रचना से हुई लेकिन आलोचना हुई जो ऐसे विषय पर हुई आलोचना मानी जा रही है जो सत्ताधारी दल के लिए सबसे ज्वलंत मुद्दा है फिलहाल एमसीबी जिले में।


Share

Check Also

अम्बिकापुर@यूजीसी नियमों के खिलाफ स्वर्ण समाज का ऐलान,1 फरवरी को अंबिकापुर बंद

Share अम्बिकापुर,29 जनवरी 2026 (घटती-घटना)। यूजीसी के नए नियमों के विरोध में प्रस्तावित 1 फरवरी …

Leave a Reply