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कोरिया@अखिलेश चंद्र गुप्ता के अग्रणी महाविद्यालय बैकुंठपुर में भ्रष्टाचार के 26 साल बेमिसाल

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-रवि सिंह-
कोरिया,30 अगस्त 2025 (घटती-घटना)। दो चरण में सेवानिवृत्ति प्रभारी प्राचार्य अखिलेश चंद्र गुप्ता ने 26 साल बैकुंठपुर महाविद्यालय का प्रभार संभाला है, अखिलेश चंद्र गुप्ता की नौकरी में से 26 साल सिर्फ बैकुंठपुर महाविद्यालय के प्रभार में उन्होंने बिताए हैं, इस बीच नवीन महाविद्यालय का भी प्रभार इनके पास रहा, इनका इतिहास काफी लंबा है 26 साल में कई सरकारे आई और गई पर प्रभारी प्राचार्य अखिलेश चंद्र गुप्ता फेवी म्कि की तरह प्रभारी प्राचार्य की कुर्सी पर चिपके रहे, महाविद्यालय की स्थापना 1982 में हुई थी महाविद्यालय की स्थापना के 43 साल हो चुके हैं इस 43 साल में इस महाविद्यालय में इनके अलावा सिर्फ आठ लोगों ने ही यहां के प्राचार्य पद पर जिम्मा संभाला या उन्हें सौभाग्य हासिल हो पाया, महाविद्यालय के 43 साल में से 26 साल सिर्फ अखिलेश चंद्र गुप्ता के रहे जो भ्रष्टाचार की मिसाल बन सकते है ऐसा अब कहा जाने लगा है, उनके पूर्व कोई भी प्राचार्य एक साल से 2 साल इस महाविद्यालय में नहीं रहा, अखिलेश चंद्र गुप्ता ही ऐसे इकलौते महापुरुष प्राचार्य हैं जिन्होंने दो चरण में अपने 26 साल पूरा किया,पहले चरण इनका प्रभारी प्राचार्य का कार्यकाल 1997 से 2009 तक रहा जो 12 साल का था,दूसरा चरण 2 साल बाद फिर आया इनके जीवन में जो 2011 से 2025 तक का था जो महाविद्यालय के प्राचार्य की कुर्सी पर इन्हें सुशोभित कर गया,14 साल और इन्हें प्राचार्य बनने का मौका मिला,कुलमिलाकर 26 साल इन्हें महाविद्यालय के प्रभारी प्राचार्य बने रहने का मौका मिला। लगभग अपनी 30 से 35 साल की नौकरी में 26 साल बैकुंठपुर महाविद्यालय का प्रभारी प्राचार्य बनकर बिता दिया इन्होंने,यह 26 साल इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुका है, इतना लंबा कार्यकाल इस महाविद्यालय में किसी भी प्राचार्य का नहीं रहा और आगे भी नहीं रहेगा, अधिकतम 3 वर्ष ही कोई भी प्राचार्य यहां बने रहे, इनसे पहले सिर्फ 10 लोगों को ही यह मौका मिला। क्या यह 26 साल इस महाविद्यालय में भ्रष्टाचार के लिए था?

जिन पदों पर 3 साल से अधिक नहीं रहना चाहिए उस पद पर 26 साल कैसे रहे अखिलेश चंद्र गुप्ता?
सभी विभागों में 3 साल में ट्रांसफर हो जाता है पर इतने बड़े महाविद्यालय में 26 साल तक एक ही व्यक्ति एक ही पद पर पदस्थ रहा किसी ने भी उनका स्थानांतरण करने की हिम्मत नहीं जुटाई, क्या 26 साल इसीलिए दिया गया कि वह महाविद्यालय में जमकर अनियमितता फैला सके भ्रष्टाचार कर सके? क्या 3 साल वाली पॉलिसी उनके लिए खत्म कर दी गई तमाम तरह के सवाल है पर इस सवाल का जवाब शायद उच्च शिक्षा विभाग में बैठे जिम्मेदार भी ना दे पाए।
शासकीय रामानुज प्रताप सिंहदेव अग्रणी महाविद्यालय बैकुंठपुर के सेवानिवृत्त प्रभारी प्राचार्य की वित्तीय अनियमितता सामने आई है…
शासकीय रामानुज प्रताप सिंहदेव अग्रणी महाविद्यालय बैकुंठपुर के सेवानिवृत्त प्रभारी प्राचार्य की वित्तीय अनियमितता सामने आई है,सूचना के अधिकार के तहत मिले कैश बुक में इतनी अनियमिताएं हैं कि उसकी जांच हो जाए तो कार्यवाही होना तय है, वित्तीय अनियमितताओं में यह भी देखा गया कि कैश बुक में तीन-चार साल से बैंक/ट्रेजरी टोटल ही नहीं हुआ है,क्या सेवानिवृत्ति प्रभारी प्राचार्य के पास कैलकुलेटर नहीं था जिस वजह से वह टोटल नहीं कर पाए? सूत्रों का यह भी कहना है कि कैश बुक सेवानिवृत्ति प्रभारी प्राचार्य ही रखते थे और स्वयं ही भरते थे, क्या यह काम भी प्रभारी प्राचार्य का है या फिर कार्यालय के किसी बाबू का? क्या प्रभारी प्राचार्य का काम भी है कैश बुक लिखना? कैश बुक में इतना कटपिट है कि ऐसा लग रहा है कि कैश बुक में फर्जीवाड़ा करने का प्रयास किया गया है,सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि 6 सालों में कैश बुक का ऑडिट नहीं करवाया गया और ना ही उच्च शिक्षा विभाग ने इसकी ऑडिट रिपोर्ट इनसे मांगी ही है,जबकि ऑडिट रिपोर्ट हर साल होना अनिवार्य है 6-7 सालों तक ऑडिट रिपोर्ट क्यों नहीं करवाई गई यह भी बड़ा सवाल है,कहीं ना कहीं कैश बुक को देखकर यह आभास होता है कि इस कैश बुक में काफी झोलझाल है यदि इस कैश बुक की जांच सूक्ष्मता से हो जाए तो वित्तीय अनियमितता जरूर मिलेगी।

26 साल एक ही जगह पर पदस्थ होकर इन्होंने उच्च शिक्षा विभाग को ठेंगा दिखाया?
ट्रांसफर नीति भी इसीलिए बनी है कि कोई भी एक जगह पर बैठकर अनियमितता न फैला सके इसलिए ऐसे पदों पर 3 साल से अधिक नहीं रखा जाता है किसी को भी, पर सवाल यह उठता है कि आखिर 26 साल एक ही जगह एक ही कॉलेज में अखिलेश चंद्र गुप्ता को कैसे रहने की अनुमति मिली? वह भी वहां पर जहां पर वित्तीय अनियमितता का खतरा रहता हो। देखा जाए तो अखिलेश चंद गुप्ता अपने पहुंच पकड़ से उच्च शिक्षा विभाग को भी ठेंगा ही दिखाए, कोई भी उनका स्थानांतरण नहीं कर पाया सरकार कांग्रेस की रही हो या फिर भाजपा की सभी के कार्यकाल में उन्होंने अपना दबदबा बनाए रखा,सेवानिवृत होने के बाद उनकी वही आदत देखने को मिली कि उनसे बड़ा कोई नहीं है, महाविद्यालय में गए और अनाधिकृत होने के बावजूद भी अपने सामने खड़े होकर कर्मचारियों से ही दस्तावेज आग के हवाले करवा दिया पर किसी में हिम्मत नहीं है की कार्यवाही कर सके? देखा जाए तो उच्च शिक्षा विभाग को भी वह कुछ नहीं समझते हैं यह साफ है।
कैशबुक में अनियमितताओं के आरोप, प्रधानमंत्री कार्यालय तक हुई शिकायत
डॉ अखिलेश चन्द्र गुप्ता,पूर्व प्रभारी प्राचार्य शासकीय रामानुज प्रताप सिंहदेव स्नातकोत्तर महाविद्यालय बैकुण्ठपुर,जिला-कोरिया (छ.ग.) द्वारा सेवाकाल के दौरान किए गए अनियमिताओं की जांच कराने एवं उचित कार्यवाही किए जाने की शिकायत पीएमओ तक चली गई है, शिकायतकर्ता ने शिकायत पत्र में लिखा है की डॉ0 अखिलेश चन्द्र गुप्ता पूर्व प्रभारी प्राचार्य जो कि शासकीय रामानुज प्रताप सिंहदेव स्नातकोत्तर महाविद्यालय बैकुण्ठपुर, जिला कोरिया (छ.ग.) में लगभग 26 वर्षों तक प्रभारी प्राचार्य के पद पर कार्यरत रहे। सूचना के अधिकार के तहत् जो जानकारी प्राप्त हुई है उसमें उनके पी.डी. कैशबुक में लगभग 04 वर्षो से योग नहीं किया गया है,जो कि वित्तीय अनियमितता के अन्तर्गत आता है। उसकी जांच किया जाना न्यायसंगत होगा। डॉ. गुप्ता के कार्यकाल में कैशबुक में काफी ज्यादा आंकड़ों में कटिंग की गई है और कही कही पर तो पूरा का पूरा पेज ही कैन्सिल कर दिया गया है। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि पेज कैन्सिल करने के उपरान्त अथवा आंकड़े बदलने के उपरान्त कही पर भी लघु हस्ताक्षर नहीं है। शासन के नियमानुसार कैशबुक,बिल व्हाउचर,स्टॉक रजिस्टर आदि लिपिक के प्रभार में होना चाहिए था,ताकि लिपिक से त्रुटि होने पर प्राचार्य द्वारा कार्यवाही की जा सकती है,किन्तु डॉ. गुप्ता कैशबुक स्वयं लिखते थे, ऐसे में यदि त्रुटि होगी तो किसके द्वारा कार्यवाही की जाएगी। कैश बुक में काफी त्रुटियां है, जिस पर कार्यवाही किया जाना नितान्त आवश्यक है। डॉ. गुप्ता की पत्नी डॉ. प्रीति गुप्ता भी उसी महाविद्यालय में विगत् 20 वर्षों से सहायक प्राध्यापक एवं वर्तमान में नवीन शासकीय महाविद्यालय पोडी बचरा की प्रभारी प्राचार्य भी है, डॉ. प्रीति गुप्ता को प्रभारी प्राचार्य के पद से हटाकर पोड़ी बचरा महाविद्यालय की भी जांच कराई जाए। क्रीड़ा एवं प्रयोगशाला सामग्री खरीदी में भी काफी अनियमितता की गई है,स्टॉक रजिस्टर व बिल का मिलान कराने पर सत्यता सामने आ जाएगी। सेवानिवृत्त वाले माह जनवरी 2025 में डॉ गुप्ता द्वारा लगभग 40 लाख रूपये की खरीदी की गई है। जब भी कोई नवीन महाविद्यालय प्रारम्भ होता था तो उसका प्रभार डॉ. गुप्ता को ही प्रदाय किया जाता था,उसके बाद इनके द्वारा सिर्फ क्रय का खेल खेला जाता है। नवीन महाविद्यालय नागपुर,पटना महाविद्यालय एवं नवीन महाविद्यालय पोड़ी बचरा में,जहां स्वयं का भवन नहीं है एवं मात्र दो से तीन कमरों में महाविद्यालय संचालित है,वहां भी लाखों रूपये की क्रीड़ा, लैब एवं फर्नीचर की खरीदी की गई है। डॉ0 गुप्ता द्वारा क्रीड़ा एवं लैब की सामग्री को बहुत जल्दी अपलेखित कर दिया जाता था, क्रीड़ा सामग्री में तो सामग्री क्लोजिंग के बाद डॉ0 गुप्ता द्वारा अपने हाथ से स्टॉक बैक डेट में आगे नए पेज में चढ़ाया गया है। जो कि नियम के अनुकूल नहीं है। पोड़ी बचरा,नागपुर एवं बैकुण्ठपुर में भी लाखों रूपये की मजदूरी निकाली गई है। मजदूरी में कार्य किए गए लोगों का मस्टर रोल अथवा उपस्थिति रजिस्टर के नाम पर महाविद्यालय में कोई भी रिकार्ड नहीं है। जिससे स्पष्ट होता है कि मजदूरी पूरी तरह फर्जी तरीके से निकाली गई है। मनरेगा एवं सभी कार्यालयों में मजदूरी का भी भुगतान ऑन लाईन मजदूर के खाते में किया जाता है, लेकिन डॉ. गुप्ता के द्वारा अपने महाविद्यालय की लाखों रूपये की मजदूरी भुगतान अपने खाते में लेकर नगद भुगतान दिखाया गया है। शासन के नियमानुसार 5000 से अधिक का भुगतान वेण्डर के माध्यम से होता है लेकिन डॉ. गुप्ता के द्वारा रू. 1,50,000 तक का भुगतान अपने खाते में लेकर निकाला गया है। बिलों में कोई पावती भी नहीं है, जिससे ऐसा लगता है कि शायद दुकानदारों को भुगतान नहीं किया गया है, कोरिया जिला बाकी जिलों की तुलना में काफी छोटा जिला है,लगभग डेढ़ ब्लॉक का जिला है। ऐसे में इस छोटे से जिले के उन सभी कॉलेजों में जिनमें डॉ. गुप्ता रहे है वहां बहुत ज्यादा फण्ड आया है,इतना फण्ड तो राजधानी के महाविद्यालय में भी नहीं आता है। यह भी एक जांच का विषय है। डॉ अखिलेश चन्द्र गुप्ता के कार्यकाल की जांच के दौरान यदि वसूली होती है तो जीपीएफ एकमात्र है जिससे वसूली की जा सकती है,क्योंकि वर्तमान प्रभारी प्राचार्यों पर दबाव बनाकर अवकाश नगदीकरण,ग्रेज्युटी एवं जीआईएस का भुगतान करवा लिया गया है। डॉ. अखिलेश चन्द्र गुप्ता द्वारा जीपीएफ भुगतान हेतु प्रकरण बनवाकर भेजवाया गया है एवं जीपीएफ भुगतान हेतु महालेखाकार कार्यालय में जुगाड़ लगवाया जा रहा है।
भ्रष्टाचार से जुड़े कुछ सवाल
सवाल- पीडी कैश बुक एवं जनभागीदारी कैश बुक महाविद्यालय में लिपिक होने के बाद भी प्राचार्य डॉ. अखिलेश चंद्र गुप्ता खुद अपने पास रखते थे और स्वयं कैश बुक को लिखते थे?
सवाल- अब महाविद्यालय का प्राचार्य ही यदि कैश बुक लिखेगा तो फिर लिपिक का वहां पर क्या काम है?
सवाल- क्या ऐसा वित्तीय अनियमितता करने के लिए किया गया था?
सवाल- कैश बुक में यह भी देखा गया कि लगभग 4 वर्षों से कैश बुक में बैंक व ट्रेजरी टोटल नहीं है, क्या टोटल करने के लिए उनके पास कैलकुलेटर उपलब्ध नहीं था या फिर टोटल करना नहीं चाह रहे थे?
सवाल- सीधे सेवानिवृत्त होने के बाद ही वह टोटल होगा और सेवानिवृत होने के बाद भी टोटल नहीं हुआ और अब उसके लिए अनुमति क्यों मांगी जा रही है?
सवाल- जब आपको पता था कि आपकी सेवानिवृत्ति की तिथि क्या है फिर भी आपने सेवानिवृत्ति के अंतिम महीने में भी ना तो कैश बुक का ऑडिट कराया और ना ही अपने ट्रेजरी बैंक का टोटल कराया और कैश बुक आखिर यह क्यों लिख रहे थे यह सबसे बड़ा सवाल है उच्च शिक्षा विभाग के लिए?
कैश बुक की कमियों की झलक:-
कमी :- पी.डी. कैश बुक एवं जनभागीदारी कैश बुक महाविद्यालय में लिपिक होने के बाद भी प्राचार्य डॉ0 ए0 सी0 गुप्ता बिल एवं कैश बुक को खुद अपने पास रखते थे एवं कैश बुक को भी खुद ही लिखते थे…
कमी :- विगत् 04 वर्षो से कैश बुक में बैंक/ ट्रेजरी टोटल नहीं है…
कमी :- यदि राशि कैश बुक नगद में वृद्धि हुई है तो कैश बुक में नगद राशि कहां से आई है यह पता नहीं चल रहा है क्योंकि बैंक/ ट्रेजरी क्लोजिंग नहीं है।
कमी :- 31.01.2025 को सेवानिवृत्त हुए तब भी कैश बुक कम्पलीट नहीं था…
कमी :- छःह माह बाद जब अपर संचालक अम्बिकापुर के उपस्थिति में दिनांक 28.06.2025 को प्रभार दिए तब भी कैश बुक कम्पलीट नहीं है…
कमी :- जगह- जगह हस्ताक्षर क्यों छोड़े गए…
कमी :- जगह-जगह कटिंग कर आंकड़ों से छेड़छाड़ की गई है। यदि कही सुधार होता है तो वहां लघु हस्ताक्षर होना चाहिए लेकिन ऐसा कुछ नहीं है…
कमी :- टोटल का न होना यह प्रदर्शित करता है कि शायद पूर्व प्रभारी प्राचार्य आंकड़ों को बदलना चाह रहे थे…
कमी :- उक्त कार्य वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में आता है।
कमी :- 2019 के बाद से ऑडिट नहीं…


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