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कोरिया@कोरिया में अद्भुत नजारों के कई पयर्टन स्थल जो बना सकते है प्रदेश में अलग पहचान

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-राजन पाण्डेय-
कोरिया,17 अगस्त 2025 (घटती-घटना)। अविभाजित कोरिया जिले में बहुत से प्राकृतिक स्थल ऐसे थे जो पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हुए कुछ अभी किये भी जा रहे हैं लेकिन जिला विभाजन के बाद कोरिया के अधिकांश पर्यटन स्थल अब मनेन्द्रगढ़ चिरमिरी और भरतपुर जिले का हिस्सा बन गए लेकिन बावजूद इसके कोरिया जिले में अभी पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने लायक कई प्राकृतिक स्थल है जिन्हें अच्छे से विकसित किया जाए तो ये प्रदेश स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाने में सफल हो सकते है। बस जरूरत है इन्हें संरक्षण और विकास की। जी हां हम कोरिया जिले के ऐसे प्राकृतिक स्थलों के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्हें यदि विकसित किया जाए तो इससे जिले की पर्यटन क्षेत्र में अलग पहचान गढ़ी जा सकती है।
कोरिया की शान बालमगढ़ी

गुरुघासीदास राष्ट्रीय उद्यान में स्थित बालमगढ़ी पर्यटन स्थल जहां की वादियां सबसे अलग है यहां का नजारा देखने प्रतिदिन सैकड़ो लोग पहुचते हैं इस पहाड़ी से 180 डिग्री का नजारा देखा जा सकता है। इस पर्वत श्रृंखला पर खुले आसमान में भारतीय गिद्धों को उड़ते देखा जा सकता है। साथ ही भालू,बंदर, हिरण,नीलगाय,कोटरी सांभर आदि जानवर भी कभी-कभी दिख जाते हैं। इस पहाड़ी के ऊपर से गोपद और हसदो नहीं का उद्गम उस प्राकृतिक मान्यता को प्रमाणित करता है जिसके आधार पर यह माना जाता है कि इस पर्वत श्रृंखला का शीर्ष दो नदी प्रवाह प्रणालियों का निर्माण करता है। ऊपर से उत्तर की ओर बहने वाली गोपद नदी अपने प्रवाह तंत्र में 20 से अधिक नदियों और नालों को मिलाकर गंगा बेसिन का हिस्सा बन जाती है। ऊपर से दक्षिण की ओर बहने वाली हसदो महानदी बेसिन का हिस्सा बन जाती है। इन दोनों का उद्गम यहीं देखा जा सकता है। साथ ही यहां की ढलानों पर शैल चित्र भी देखे जा सकते हैं इस पहाड़ी की चोटी से लगभग 4 किमी पश्चिम में तथा मास्टर टॉवर से 1 किमी दूर स्थित वन विभाग द्वारा निर्मित बसाहवा टॉवर भी एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण है।
नीलकंठ पहाड़ का विहंगम नजारा

विकासखंड सोनहत मुख्यालय से 80 किलोमीटर दूर गुरू घासीदास राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में स्थित नीलकंठ ग्राम जो चारों ओर से पहाडि़यों की बच बसा है यहां की ऊंची ऊंची पहाडि़यां अपने आप में देखने लायक है और उसी पहाड़ की चोटी पर शिवलिंग स्थापित है जिसे नील कंठ के नाम से जाना जाता है। यहां सावन माह में दूर-दूर से श्रद्वालु भगवान शिव की पूजा करने पहुचते है। दुर्गम वन क्षेत्र में स्थित इस प्राकृतिक शिव मुर्ति को लेकर कई तरह की किवदंतियां जुडी हुई है। यही वजह है कि अत्यंत दुर्गम एवं पहुच विहीन होने के बावजूद यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या बढती जा रही है। इस जगह पर पहुंचना आसान नहीं है क्योकी उक्त स्थान पर पहुचने के लिए भीषण पहाड़ पर चढना पड़ता है जिसके लिए उपयुक्त मार्ग नही है कोरिया रियासत के समय इस जगह खोज की गई थी। यहां एक गुफा में प्राकृतिक रूप से शिविलिंग स्थित हैं। घने जंगल में स्थित गुफा के अंदर घुटनों के बल जाना पड़ता हैं। यहां छत्तीसगढ़ के अलावा मध्यप्रदेश के कई जिलों से श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। मान्यता है कि यहां आने से मनोकमना पूरी होती है। दिवार के जैसा पहाड़ व झरने का संगम नीलकंठ में एक पतले पत्थर की अनोखी पहाड़ी भी है जो देखने में अदभुद एवं आश्चर्यजनक भी है जिसे लोगों को देखने के बाद समझ नही आता की यह दिवार किस आधार पर इतने लंबे अरसों से टिकी हुई है वहीं स्थानीय लोगों के मुताबिक इस दिवार में कभी कभार कंपन भी होता है बावजूद इसके यह दिवार जैसा पहाड़ टिका हुआ है साथ ही लोगों का यह भी कहना है की अब इस पहाड़ की उंचाई काफी कम हो गई है इसके अतिरिक्त इसी पहाड़ के बगल से लगा हुआ झरना जो अत्यंत उंचाई से जमीन पर गिरते हुए लोगों का मन मोह लेता है। सूखी लकड़ी के उपर से निकलता है पानी इस स्थान पर प्रकृति का एक अनोखा दृश्य यह भी देखने को मिलता है की यहां पर एक सूखी लकड़ी से पानी की धारा निरंतर निकलती रहती है जिसके जल स्रोत का आज तक पता नही चल पाया है आस पास के ग्राम जनों का मानना है की यह पानी इस सूखी लकड़ी से प्राचीन काल से निकलता ही आ रहा है जो आज तक बंद नही हुआ है।
जोगी मठ को संरक्षण की दरकार
विकासखंड सोनहत में दर्जनों की संख्या में ऐसे पुरातात्विक स्थल है जो की 6वीं शाताब्दी के है जो प्राचीन शाताब्दी इतिहास के बारे में अपनी पहचान बनाए रखे है परन्तु प्रशासन की उदासीनता के कारण अब ये पुरातात्विक स्थल गुमनामी के दौर से गुजर रहे है। इनकी पहचान प्रदेश स्तरीय तो दूर महज जिला स्तरीय भी नहीं हो पायी है। विकाश खण्ड सोनहत अंर्तगत ग्राम कैलाशपुर घुघरा जंगल के मध्य स्थित जोगी मठ देव स्थल पुरे सरगुजा संभाग का सबसे पुराना देव स्थल एवं पुरातात्विक स्थल है इतिहासकारो की माने तो यह छठवी शाताब्दी से भी पुराना है आज भी काभी कभार बहुत दूर दराज से इस स्थान में लोग महावीर स्वामी के दर्शन के लिये आते है परन्तु सुविधाओं के अभाव में लोगों को बहुत परेशानीयों का सामना करना पड़ता है। उल्लेखनीय है की जोगी मठ पुरातत्विक स्थल तक पहुचने के लिए पहुच मार्ग नहीं होने के कारण वाहन चालकों के दुर्घटना डर बना रहता है। इसी क्रम में विकासखण्ड सोनहत का दुसरा और छठवी शाताब्दी का पुरातात्विक स्थल गांगीरानी देव स्थल भी उपेक्षा का शिकार हो रहा है, गांगीरानी देव स्थल गुरूघासीदास राष्ट्रीय उद्यान अन्तर्गत ग्राम रामगढ़ नटवाही में स्थित है। जहां भव्य रूप से पत्थरों की चट्टानों को काट कर देव स्थल बनाया गया है। यह मन्दिर इतना अद्भुत है की देखने मात्र से सैलानियों का दिल खुश हो जाता है। परन्तु मूल भूत सुविधाओं के अभाव में यह भी अपना पहचान खोता जा रहा है।
राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में 11 अद्भुत स्थान

कोरिया जिले के अलग-अलग इलाकों में प्राकृतिक रूप से कई धार्मिक स्थल स्थापित हैं। उन्ही में से एक है सीतामढ़ी गुफा। राष्ट्रीय उद्यान के जंगलों के बीच दुर्गम रास्तों से होकर इस धाम तक पहुचा जा सकता है। यहां पहुंचने के लिए काफी दूर तक घने जंगल में पैदल चलना पड़ता है। श्रद्धालुओं का मनना है कि वे पिछले कई सालों से यहां आ रहे है। यहां आने से सभी मनोकमना पूरी होती है। सीतामढ़ी धाम के आसपास कोई गांव नहीं है। ऐसे बियाबान जंगल में पगडंडी रास्तों से होकर कठिनाई से पहुंचने के बाद श्रद्धालुओं को यहां सुखद अनुभूति होती है। ऐसा कहा जाता है की वनवास के दौरान प्रभु श्री राम ने कुछ देर इस स्थान पर माता सीता के साथ विश्राम किया था उक्त स्थान पर कई पद चिन्ह भी मौजूद है। सीतामढी के बाद राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में आमापानी दर्शनीय स्थल भी बेहद अदभुद है यहां पर गोपद नदी का उदगम आम के जड़ से हुआ है इसी लिए इसे आमा पानी कहा जाता है।
हसदो नदी का उद्गम स्थल मेण्ड्रा

हसदेव नदी भारत के छत्तीसगढ़ राज्य में बहने वाली एक नदी है। यह महानदी की एक प्रमुख सहायक नदी है तथा कोरबा के कोयला क्षेत्र में तथा चम्पा मैदान में प्रवाहित होने वाली प्रमुख नदी है। यह नदी कोरिया जिले की कैमूर पहाडि़यों से निकलकर कोरबा,बिलासपुर जिलों में बहती हुई महानदी में मिल जाती है। हसदेव का अधिकांश प्रवाह क्षेत्र ऊबड़-खाबड़ है। इसकी प्रवाह क्षेत्र 7,210 वर्ग किमी है हसदेव नदी, छत्तीसगढ़ राज्य के महानदी की एक प्रमुख सहायक नदी है। इस नदी का उद्गम यह नदी कोरिया जिले के कैमूर की पहाडि़यों से होता है। इस नदी की कुल लंबाई 179 किमी है। राज्य का सबसे ऊँचा बांध मिनीमाता इसी नदी पर कोरबा जिले में स्थित है। इसका उद्गम स्थल गुरु घासीदास राष्ट्रीय के सीमा पर स्थित ग्राम मेण्ड्रा से हुआ है यहां पर डॉ चरणदास महंत ने अपने केंद्रीय मंत्री रहते हुए भव्य शिव मंदिर का निर्माण करवाया था।
घुंघटा बांध और ट्री हाउस प्रोजेक्ट

कोरिया जिला मुख्यालय से 30 किमी और सोनहत ब्लॉक मुख्यालय से 8 किमी दूर परिहत गांव का घुनघुट्टा डैम को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहां पर्यटकों की सुविधा के लिए तीन ट्री-हाउस और एक सर्वसुविधायुक्त रेस्टोरेंट तैयार किया गया है। जल्द ही इन्हें पर्यटकों के लिए खोला जाएगा। डैम के किनारे प्राकृतिक सुंदरता पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगी। मिली जानकारी अनुसार पूर्वर्ती सरकार में इस कार्य का शिलान्यास विधानसभा अध्यक्ष डा चरणदास महंत व तत्कालीन विधायक गुलाब कमरो ने किया था मिली जानकारी के अनुसार इस परियोजना के लिए 1 करोड़ से अधिक खर्च किया गया है। इसके संचालन को लेकर तैयारी की जा रही है।प्रशासन ने उम्मीद जताई है कि इससे हर साल लाखों रुपए की आमदनी होने के साथ ग्रामीणों को रोजगार मिलेगा। वहीं ट्री-हाउस के साथ कार्यालय, गार्डन एवं अन्य सुविधाएं भी तैयार की गई हैं। पर्यटक यहां रात में ठहर भी सकेंगे। यह दिखने मे बेहद आकर्षक और सुंदर है।
गौरघाट जलप्रपात का अद्भुत सौंदर्य

हसदेव नदी पर स्थित यह जलप्रपात जिसे गौरघाट जलप्रपात के नाम से जाना जाता है जो कोरिया के जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर की दूरी पर सोनहत विकासखण्ड के ग्राम बसेर में स्थित है है। गौर घाट के झरना स्थल पर 2 रास्तों से पहुंचा जा सकता है। जिला मुख्यालय बैकुण्ठपुर से नगर ग्राम होकर बसेर पहुंचकर इस स्थल पर पहुंचा जा सकता है। एवं सोनहत मुख्य मार्ग के कटगोडी ग्राम से पश्चिम दिशा की ओर दामुज बसेर होकर जाया जा सकता है। यहां हसदो नदी पर बनने वाले पहले जल प्रपात को गौरघाट जलप्रपात कहा जाता है। प्रपात के गिरने के स्थल के पहले एवं प्रवाह की ओर अकॅत प्राकृतिक सौंदर्यता प्रकृत ने स्थापित कर रखी है जो पर्यटकों को बारम्बार यहां आने हेतु आमंत्रित करती है। परंतु झरने के गिरने के स्थल पर निर्मित जलकुण्ड के प्रति सावधानी रखने की जरूरत होती है।
अद्भुत स्थान जो पर्यटन स्थल में किया जा सकता है तब्दील
खेकडा माडा हिलटॉप:- इस हिलटाप से सघन वन, घाटी एवं पहाड़ का आनंद लिया जा सकता है।
गंगा रानी माता की गुफा:- यह रॉक कट गुफा है जहां गंगा रानी माता विराजमान है। गुफा के पास बहुत बडा तालाब है जिसमें सालों भर पानी रहता है। यहां रामनवमी के अवसर पर मेला लगता है।
आनंदपुर:- आनंदपुर अपने नाम के अनुरूप सघन नदियों से घिरा रमणीक स्थल है। यह चारों ओर से ऊंचे-ऊंचे जलप्रपात एवं झरनों से घिरा मनोहारी स्थल है।
बीजाधुर:- यह कल कल कर बहता हुआ सदाबहारी पहाड़ी नदी है। यहॉं बैठकर सघन वन, एंव पक्षियों की कलरव एवं उनकी जलकीडा का आनंद लिया जा सकता है।
सिद्धबाबा की गुफा:- सर्प देवता स्वरूप में सिद्ध बाबा का निवास स्थल है यहां रामनवमी के दिन मेला लगता है। यहॉं लोग मन्नत भी मांगते हैं।
च्यूल जलप्रपात:- यह च्यूल से लगभग 5 कि.मी. की दूरी पर सघन वन से घिरा लगभग 60 फीट की ऊंचाई से गिरता सदाबहार जल प्रपात है। नीचे जल कुंड है जिसमें जलक्रिडा का आनंद लिया जा सकता है।
खोहरा पाट:- यह च्यूल से लगभग 20 कि.मी. है यह स्थान पाइंट हैलटाप पर है जहां खोहरा ग्राम बसा है। यहां से सघन वन, एवं घाटी का विहगंम दृश्य देखते ही बनता है।
छतोडा की गुफा:- यह एक रॉक कट छोटी गुफा है जिसमें ग्राम देवता की मूर्तियां हैं।
नेउर नदी:- खोहरा पाट से नीचे उतरने पर सदाबहार कल-कल बहती नेउर नदी का चौडा पाट का नजारा देखते बनता है नदी का जल गहरा है रोमांचक स्थल है होने के साथ साथ छत्तीसगढ और मध्यप्रदेश को जोड़ती भी है।


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