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कोरिया@क्या सेवानिवृत्त प्रभारी प्राचार्य अपनी जमीन बनाने में थे व्यस्त,इस वजह से महाविद्यालय की भूमि आज तक नहीं हुई महाविद्यालय के नाम जमीन ?

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-रवि सिंह-
कोरिया,12 अगस्त 2025 (घटती-घटना)। अग्रणी महाविद्यालय रामानुज प्रताप सिंह देव को लग सकता है बड़ा झटका,क्योंकि उनके कब्जे की जमीन किसी अन्य विभाग को देने की हो रही तैयारी। जो जमीन 1986-87 में हो जानी थी महाविद्यालय के नाम, वह जमीन 26 साल तक कार्यरत प्रभारी सेवानिवृत्त प्राचार्य की लापरवाही की वजह से महाविद्यालय के नाम नहीं हो पाई। 26 साल में महाविद्यालय की कब्जे वाली जमीन को महाविद्यालय के नाम नहीं करवा पाए सेवानिवृत्ति प्रभारी प्राचार्य अखिलेश चंद्र गुप्ता। आज जिस वजह से महाविद्यालय की जमीन दूसरे विभाग को हस्तांतरण होने के कार्यवाही शुरू हो गई है। 1986 में अविभाजित सरगुजा के समय बैकुंठपुर के अपर कलेक्टर ने उक्त भूमि को महाविद्यालय के नाम करने सरगुजा कलेक्टर को पत्र लिखा था और प्रकरण भी दर्ज कराया था। प्रकरण दाखिल होने के बाद उचित सुनवाई पश्चात संबंधित भूमि को महाविद्यालय के नाम करने संबंधी आदेश भी हुआ था जारी,इसके बाद महाविद्यालय के प्राचार्य को सिर्फ वह जमीन महाविद्यालय के नाम राजस्व विभाग से बातचीत करके करनी थी। पर वह मामला ठंडा बस्ते में पड़ा रहा और आज 33 साल बाद महाविद्यालय की जमीन दूसरे विभाग को देने की सुगबुगाहट हो रही है।
अग्रणी महाविद्यालय रामानुज प्रताप सिंहदेव की शुरुआत 1982 में हुई थी, जिस समय अविभाजित मध्य प्रदेश राज्य था और जिला सरगुजा था। इस महाविद्यालय को लगभग 43 वर्ष हो चुके हैं,यह महाविद्यालय अक्टूबर 1982 में बीटीआई बिल्डिंग में संचालित हो रहा था। 1999 तक यह महाविद्यालय इस भवन में संचालित होता रहा। इसके बाद उस भवन में मॉडल स्कूल संचालित होने लगा,क्योंकि उस समय महाविद्यालय की अपनी खुद की भवन बन गई थी,जब मॉडल स्कूल वहां से बंद हुआ,फिर वह भवन महाविद्यालय के पास उसी के प्रांगण में रही और वहां पर महाविद्यालय की कुछ कक्षा लगती रही, जो आज भी लग रही है। उस भवन में मरम्मत कार्य भी समय समय पर होती रही महाविद्यालय के पैसे से। उस भवन का कई बार मरम्मत कार्य किया गया। वह भवन महाविद्यालय के अधीन थी और उस जमीन को भी महाविद्यालय के नाम करने के लिए 1986-87 में प्रक्रिया शुरू हो गई थी। अंतिम दौर में वह सिर्फ महाविद्यालय के नाम होना था पर महाविद्यालय के प्रभारी प्राचार्य जिन्होंने 26 साल तक इस महाविद्यालय की कुर्सी पर सुशोभित रहे, उन्होंने इस जमीन को महाविद्यालय के नाम नहीं करा पाए और अब वर्तमान प्राचार्य भी उस जमीन को महाविद्यालय के नाम कराने में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। जिस वजह से महाविद्यालय के नाम पर जो जमीन हस्तांतरित होनी थी,वह जमीन अब दूसरे विभाग के नाम हस्तांतरित करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। जिससे महाविद्यालय को काफी नुकसान होगा। जहां सभी जिले के महाविद्यालय के पास जमीन पर्याप्त है, वहीं इस जमीन के दूसरे विभाग को हस्तांतरण होने से कोरिया जिले के इकलौते अग्रणी महाविद्यालय की जमीन कम हो जाएगी और आने वाले समय में मिलने वाले सुविधा भी महाविद्यालय से छीन ली जाएगी। पर इस बात पर किसी का भी ध्यान नहीं है,और महाविद्यालय की जमीन किसी और विभाग को देने में मौन स्वीकृति दी जा रही है। जिसके लिए उच्च शिक्षा विभाग व अग्रणी महाविद्यालय के वर्तमान प्राचार्य को विचार करना होगा,क्योंकि आगामी समय में महाविद्यालय को जमीन की आवश्यकता होगी और महाविद्यालय की जमीन कम पड़ेगी। महाविद्यालय में कई कक्षाएं और बढ़ानी है उसके लिए भी जमीन की आवश्यकता होगी। ऑडिटोरियम से लेकर कई सुविधाएं महाविद्यालय में और आवश्यक है, जो वहां पर होना है। यदि यह जमीन नियम विरुद्ध तरीके से किसी और विभाग को हस्तांतरित की जाएगी तो महाविद्यालय को नुकसान होगा। क्योंकि यह जमीन पहले से ही महाविद्यालय को हस्तांतरित करने की प्रक्रिया हो रही थी।
अग्रणी महाविद्यालय के इस गंभीर मसले पर अभी तक किसी समाजसेवी या राजनीतिज्ञ की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है सामने
कोरिया जिला के बैकुंठपुर और उसके आसपास के कई किलोमीटर के दायरे में रचे बसे लोगों की शिक्षा दीक्षा का एकमात्र समीपस्थ माध्यम रहा स्वर्गीय रामानुज सिंहदेव अग्रणी महाविद्यालय बैकुंठपुर से संबंधित भूमि के इस प्रकरण को लेकर अभी तक क्षेत्र के किसी भी समाजसेवी, शिक्षाविद और राजनीतिज्ञों की किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इस मामले में अभी तक सभी उदासीन बने हुए हैं,जो की आश्चर्य का विषय है। क्योंकि अधिकांश समाजसेवी,शिक्षाविद,और राजनीतिज्ञ इसी महाविद्यालय की शिक्षा दीक्षा का परिणाम हैं। इनके द्वारा तो उस व्यक्ति से भी सवाल पूछे जाने चाहिए, जिसने सबसे लंबे समय तक प्राचार्य और प्रभारी प्राचार्य का दायित्व इस महाविद्यालय में संभाल रखा था। आखिर क्यों इतने लंबे समय तक उनके द्वारा इस भूमि को महाविद्यालय के नाम अंकित करने के लिए कोई पहल नहीं की गई। यह तो हो ही नहीं सकता कि यह मामला उनके संज्ञान में ना रहा हो।
यदि महाविद्यालय की भूमि अन्य विभाग को आवंटित की गई तो आने वाले समय में अन्य संकायों के खुलने से भवन के लिए भूमि कहां से आएगी
रामानुज प्रताप सिंह देव महाविद्यालय कोरिया जिले का अग्रणी महाविद्यालय है,और कोरिया जिले के छात्र-छात्राओं और युवाओं की प्रारंभिक स्कूली शिक्षा के बाद एकमात्र उच्च शिक्षा का शासकीय केंद्र है। अविभाजित मध्य प्रदेश के समय से ही और अविभाजित सरगुजा जिले के समय से वर्तमान तक हजारों क्षेत्र वासियों ने इस महाविद्यालय से शिक्षा ग्रहण की है। बावजूद इसके अभी तक यह महाविद्यालय कई मायनों में अपूर्ण है। अभी भी कई विभिन्न विषयों की स्नातकोत्तर कक्षाओं का यहां अभाव है, जिसके लिए भविष्य में संभावना बनी हुई है। यदि इन कक्षाओं का संचालन प्रारंभ होगा तो महाविद्यालय को इनके संचालन के लिए अतिरिक्त कक्ष और भवन की आवश्यकता पड़ेगी। इसके साथ ही विज्ञान संकाय के कक्षाओं के विस्तार में प्रयोगशाला भवन, विभिन्न गतिविधियों को संचालित करने के लिए ऑडिटोरियम वगैरह के निर्माण की आवश्यकता पड़ेगी। इस दशा में अन्य जिलों के शासकीय अग्रणी महाविद्यालयों की तुलना में वैसे भी बैकुंठपुर महाविद्यालय में भूमि की पर्याप्तता नहीं है, यदि पूर्व में पदस्थ रहे यहां के प्राचार्यों की गलती के कारण महाविद्यालय से संबंधित भूमि अन्य विभाग को आवंटित कर दी जाती है, तो निश्चय ही महाविद्यालय प्रशासन को भविष्य में बेहद कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है।
महाविद्यालय के नाम से करने के लिए आदेश भी जारी किया गया था,लेकिन प्राचार्य की लापरवाही के कारण यह नहीं हो सका…
1982 से बीटीआई के नाम से संचालित महाविद्यालय परिसर की वर्तमान भूमि को महाविद्यालय के नाम से राजस्व दस्तावेजों में अंकित करने के लिए तत्कालीन सरगुजा अपर कलेक्टर के न्यायालय में सन 1985 में प्रकरण दर्ज हुआ था। विधि सम्मत कार्यवाही के बाद 1986-87 में इस भूमि को महाविद्यालय के नाम अंकित करने संबंधी अपर कलेक्टर न्यायालय से आदेश भी जारी हुआ था। इस आदेश के जारी होने के उपरांत केवल औपचारिकता शेष बाकी रह गई थी, भूमि को महाविद्यालय के नाम राजस्व दस्तावेजों में अंकित करने के लिए। परंतु इसे विडंबना कहें या घोर लापरवाही की तत्कालीन प्राचार्य ने और सबसे लंबे समय तक इस महाविद्यालय के प्राचार्य बने रहने के रिकॉर्ड धारी व्यक्ति ने इस महत्वपूर्ण कार्य पर अपनी कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई। परिणाम स्वरूप आज आलम यह है कि इस भूमि को पुलिस विभाग को आवंटित करने के लिए लगभग सारी औपचारिकताएं पूर्ण कर ली गई हैं। और यदि यह भूमि अन्य विभाग को आवंटित हो जाता है तो निश्चित है कि महाविद्यालय प्रशासन पर यह स्वयं के द्वारा किया गया कुठाराघात होगा।
पुराने भवन में शीट बदलना,रंग रोगन कराया, लाइट,फैन आदि में लाखों खर्च किया गया…
महाविद्यालय परिसर में स्थित जिस भूमि और जिस भवन की बात की जा रही है,वर्षों से स्थित और उस पर निर्मित भवन की मरम्मत, रंगाई पुताई और मेंटेनेंस के नाम पर महाविद्यालय प्रशासन और प्राचार्य के द्वारा लाखों रुपए खर्च किए गए हैं। क्या परिसर में स्थित यह भवन केवल कमाई का जरिया बना रहा। यदि यह केवल कमाई का जरिया नहीं था, तो इसे महाविद्यालय के नाम पर अंकित करने के लिए कोई तत्परता और कोई पहल आज तक क्यों नहीं किया गया।


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