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कोरिया@शिक्षा अधिकारी कार्यालय लिपिक रिलीविंग से बचने पहले लिया मेडिकल अवकाश फिर गायब कर दिया आवेदन ?

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-राजन पाण्डेय-
कोरिया,02 अगस्त 2025 (घटती-घटना)। कोरिया जिले के शिक्षा विभाग में इन दिनों गजब का खेल चल रहा है,जिला शिक्षाधिकारी के संरक्षण में स्थानांतरित नियम कायदे की धज्जियां उड़ाते दिखलाई दे रहे हैं,अंगद के पैर की तरह जमे कर्मचारी आखिर क्या कारण है कि कार्यालय से दूर जाना ही नही चाहते,बतलाया जाता है कि विभाग को मिलने वाले भारी भरकम बजट पर ऐसे कर्मचारियों की नजर होती है यह बजट ऐसे कर्मचारियों के लिए सफेद हाथी की तरह होता है व्यवसाय चलता रहे इसलिए स्थानांतरण के बाद भी अन्यत्र जाना नही चाहते किसी ना किसी प्रकार स्थानांतरण रूकवाने में लग जाते हैं। कोरिया जिले के शिक्षा विभाग में स्थिति और विपरित है जहां एक लिपिक का पहले तो जिले से अन्यत्र स्थानांतरण होता है स्थानांतरण होते ही उक्त लिपिक पहले कार्यालय में मेडिकल अवकाश का आवेदन देता है उसके बाद खुद को बीमार बतलाने के बाद भी राजधानी रायपुर जाकर प्रदेश के मुखिया से मिलकर स्थानांतरण निरस्त कराने का आवेदन देता है,यही नही मेडिकल अवकाश का आवेदन देने के बाद भी लगातार कार्यालय में उसकी उपस्थिति बनी रहती है,अधिकारी का स्थानांतरण होता है उसे विदाई पार्टी दी जाती है तब भी वह कर्मचारी शामिल होता है बकायदे फोटो सेशन होता है। अभी तक वह कर्मचारी रिलीव नही हुआ है डीईओ कोरिया के संरक्षण में उसे नियम की धज्जी उड़ाने की छूट मिली हुई है।
स्थानांतरण होते ही बीमार पड़ा था लिपिक मनीष पैकरा
सूत्रों का मामने तो छत्तीसगढ स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा बीते 10 जुलाई को जारी आदेश के तहत लिपिक मनीष पैकरा का स्थानांतरण कोरिया जिला शिक्षाधिकारी कार्यालय से जांजगीर किया गया है। मजे की बात है उक्त लिपिक जिसने कभी चिकित्सा अवकाश नही लिया उसने उक्त स्थानांतरण आदेश आते ही खुद को बीमार बतलाकर चिकित्सा अवकाश हेतु आवेदन दे दिया। इसके बाद भी वह लगातार कार्यालय आकर शासकीय काम करता रहा है,लेकिन सूत्रों का दावा है कि उसके द्वारा हाजरी रजिस्टर में हस्ताक्षर नही किया जाता था।
जिला पंचायत अध्यक्ष के साथ सीएम से मुलाकात
जिला शिक्षाधिकारी कार्यालय कोरिया से स्थानांतरित कर्मचारी मनीष पैकरा काफी समय से एक ही कार्यालय में पदस्थ है जिससे कि वह अन्य कर्मचारियों एवं शिक्षकों को विभिन्न तरीको से परेशान करने का काम करता है,अधिकारियों की जी हुजूरी एवं उन्हे खुश करके वह अपना उल्लू सीधा करते रहता है। बेलगाम होकर वह कार्यालय का संचालन खुद की मर्जी से करता है। शिकायत होने पर उसका स्थानांतरण जांजगीर जिले में किया गया था। लेकिन यहां से रिलीव होने की बजाए उसने जिला पंचायत अध्यक्ष एवं अन्य सामाजिक जनों के साथ प्रदेश के मुख्यमंत्री से मिलकर स्थानांतरण रूकवाने का निवेदन किया।
आरटीआई,डीएमएफ व निजी स्कूलों की मान्यता का काम देखता है लिपिक
लिपिक मनीष पैकरा को कार्यालय में सूचना का अधिकार खनिज न्यास निधि एवं निजी स्कूलों की मान्यता का काम दिया गया है। निजी स्कूलों की मान्यता देने का काम भी उसके लिए आय का जरिया बना हुआ है। साथ ही विभाग को मिलने वाले बजट पर भी उसकी नजर होती है। बतलाया जाता है कि बैंकिंग कामकाज का पासवर्ड तक उसके मोबाईल में ही आता है जिसका भरपूर फायदा मनीष पैकरा द्वारा उठाया जाता है।
जिला शिक्षाधिकारी की भूमिका दिख रही संदिग्ध,क्या लिपिक को मिला संरक्षण?
पूरे मामले में कोरिया जिला शिक्षाधिकारी जितेंद्र गुप्ता की भूमिका भी संदिग्ध दिखलाई दे रही है। बतलाया जाता है कि उक्त लिपिक को उनके द्वारा ही संरक्षण देकर रखा गया है। इसके बाद भी भाजपा शासनकाल मे अनदेखी किया जा रहा है ऐसा प्रतीत होता है कि जिला शिक्षाधिकारी ने स्थानीय विधायक से लेकर जिलाध्यक्ष एवं अन्य नेताओं को खुश कर दिया है जिससे कि उनकी कुर्सी सुरक्षित है।
आखिर क्यों नही कर रहा था रजिस्टर में हस्ताक्षर
विभागीय सूत्रों का दावा है कि चिकित्सा अवकाश का आवेदन देने के बाद भी लिपिक मनीष पैकरा कार्यालय आकर काम कर रहा था एक वायरल फोटो भी इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। उसके द्वारा कई दिनों तक हाजिरी रजिस्टर में हस्ताक्षर नही किया गया इसके पीछे क्या कारण है यह आसानी से समझा जा सकता है। एक साथ उसके द्वारा 2 दिन का सीएल लेकर बाकी दिनो का हस्ताक्षर किया जाना संदेहास्पद है इसमें डीईओ की भूमिका एवं संरक्षण से इंकार नही किया जा सकता। क्या यह घटना जांच का विषय नही है।
चिकित्सा अवकाश का आवेदन देकर कार्यालय आना और अधिकारी की विदाई पार्टी में भी शामिल
स्थानांतरण होते ही खुद को बीमार बतलाना और फिर बीते दिनों कार्यालय से अन्यत्र स्थानांतरित एक अधिकारी के विदाई समारोह में भी लिपिक मनीष पैकरा शामिल होता है,जिस अधिकारी को उसने आवेदन दिया कि मैं बीमार हूं उसके साथ ही फोटो खींचकर वायरल किया जाता है अधिकारी द्वारा यह क्यों नही देखा गया कि वह हस्ताक्षर कर रहा है या नही या फिर चिकित्सा आवेदन देकर वह कार्यालय आकर काम क्यों कर रहा है। बाद में उसका आवेदन कहां गायब हो जाता है, और
उसके द्वारा एक साथ हस्ताक्षर किया जाना अत्यंत आपत्तिजनक एवं आचरण संहिता का खुला उल्लंघन है। और यदि इन दावों को यदि जिला शिक्षाधिकारी खारिज करते हैं तो फिर एक स्थानांतरित कर्मचारी को 15 दिन बाद भी रिलीव क्यों नही गया? आखिर उसके बचाव से जिला शिक्षा अधिकारी खुद का क्या लाभ देख रहे है? क्या कार्यालय के अन्य कर्मचारियों को भी जिला शिक्षाधिकारी द्वारा इसी प्रकार का संरक्षण दिया जाता है?
क्या नियम की धज्जियां उड़ाने का अधिकार रखता है मनीष?
लिपिक मनीष लंबे समय से एक ही कार्यालय में पदस्थ है जिससे कि वह बेलगाम हो चुका है। अधिकारियों को खुश कर अपनी कुर्सी बचाए रखना आदत बन चुका है। स्थानांतरण होते ही उसने कार्यालय के भीतर जो खेल खेला है वह नियम के एकदम विपरीत है। सवाल उठता है कि उसके चिकित्सा अवकाश के आवेदन को आवक जावक में चढ़ाया गया था, यदि हां तो फिर वह आवेदन अब कार्यालय से कहां गायब हो गया, और यदि आवक-जावक में नही चढाया गया था तो क्यों इसके पीछे किसका हाथ था। आखिर चिकित्सा अवकाश का आवेदन देने के बाद भी किसके कहने पर मनीष कार्यालय आकर काम कर रहा था? और फिर यदि कार्यालय आ रहा था तो फिर हस्ताक्षर क्यों नही कर रहा था? अब उसके द्वारा एक साथ पूरे दिनों का हस्ताक्षर किसने इशारे पर किया गया है? यह अत्यंत गंभीर मामला है और जांच का विषय है? हालांकि जांच करेगा कौन क्योंकि जब विभाग प्रमुख द्वारा ही उसे संरक्षण दिया जा रहा है तो फिर आगे की बात करना बेमानी है। इसलिए जिला प्रशासन को चाहिए कि इस विषय को संज्ञान में लेकर उचित कार्यवाही करे।
आखिर डीईओ आफिस क्यों नही छोड़ना चाहता मनीष
मनीष पैकरा शिकायत के बाद स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा स्थानांतरण किया गया है, वर्षों से उसके खिलाफ शिकायतें मिल रही थीं, आखिर क्या कारण है कि मनीष पैकरा डीईओ आफिस नही छोड़ना चाह रहा है।
चिकित्सा अवकाश का आवेदन अब रद्दी की टोकरी में,2 दिन छोड़कर बाकी का किया हस्ताक्षर
विभागीय सूत्रों का कहना है कि स्थानांतरण होते ही उसने दूसरे दिन जिला शिक्षाधिकारी कार्यालय में खुद को बीमार बतलाते हुए चिकित्सा अवकाश का आवेदन दिया था,और इसी बीच ही राजधानी रायपुर में सीएम से मुलाकात हुई थी। इस बीच वह लगातार कार्यालय आकर अपना विभागीय काम काज निपटा रहा था। लेकिन उसके द्वारा हाजरी रजिस्टर में रोज हस्ताक्षर नही किया जा रहा था। लेकिन नोटशीट और जारी आदेश में उसके द्वारा इनीसियल हस्ताक्षर जरूर किया जा रहा था यह विश्वस्त सूत्रों का कहना है। बतलाया जाता है कि लिपिक मनीष पैकरा ने बीते 14 एवं 15 जुलाई का सीएल अवकाश लिया है जबकि उसने 28 जुलाई सोमवार को एक साथ पूरे दिन का हस्ताक्षर कर दिया है। पहले उसके द्वारा चिकित्सा अवकश का आवेदन दिया जाता है आवेदन सिर्फ इसलिए नही किया जाता कि उसे रिलीव कर दिया जाएगा लेकिन जब डीईओ द्वारा उसे पूरी तरह से संरक्षित कर दिया जाता है तब मनीष पैकरा द्वारा ही चिकित्सा अवकाश का आवेदन कार्यालय से गायब कर रजिस्टर में हस्ताक्षर कर दिया जाता है। पूरे मामले में जिला शिक्षा अधिकारी की भूमिका भी संदिग्ध दिखलाई दे रही है।


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