- क्या सोनहत में होने वाले कव्वाली कार्यक्रम में किसी बड़े नेता का पड़ गया काला साया?
- प्रदेश में उर्स आयोजन अंतर्गत होती है कव्वाली,कई कार्यक्रम शांतिपूर्ण संपन्न हुए,सोनहत में ही प्रशासन नाकाम दिखाई दिया इसीलिए अनुमति से किया इनकार?
- क्या पहलगाम आतंकी हमले का असर कोरिया जिले के सोनहत मजार पर ही पड़ रहा था बाकी जगहों पर दिक्कत नहीं?
- क्या कोरिया जिला प्रशासन कव्वाल कार्यक्रम संपन्न कराने में नहीं था सक्षम इसलिए आठ बिंदुओं का बताया कारण और अनुमति से झाड़ा पल्ला?
- मुस्लिम समुदाय के आस्था पर प्रशासन सहित जन प्रतिनिधियों ने फेरा पानी।
- सर्व धर्म की एकता का प्रतीक है सोनहत के बाबा भोलनशाह का मजार
- अलग अलग राज्यों से यहां पर सभी धर्मों के लोग आते है चादर चढ़ाने
- हर साल देखने को मिलता है सामाजिक सदभावना का दृष्य

-राजन पाण्डेय-
कोरिया/सोनहत 31 मई 2025 (घटती-घटना)। कोरिया जिले के सोनहत विकासखंड मुख्यालय में स्थित मुस्लिम समुदाय के दरगाह पर जिसे बाबा भूलनशाह दरगाह के नाम से जाना जाता है आयोजित होने वाला सालाना उर्स कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया है, जिसके अंतर्गत आयोजित होने वाले कव्वाली कार्यक्रम की अनुमति जिला प्रशासन ने नहीं दी है जिसके बाद अब जिले के मुस्लिम धर्मावलंबी निराश हैं जिला प्रशासन के निर्णय को लेकर वह उदास हैं, जिला प्रशासन ने इस आयोजन की अनुमति तब निरस्त की या नहीं दी जब टेंट पंडाल लग चुके थे और आधी से ज्यादा तैयारी कर ली गई थी।वैसे पूरे प्रदेश में मुस्लिम समाज के द्वारा सालाना उर्स कार्यक्रम आयोजित किया जाता है जिसके अंतर्गत देश के विख्यात कव्वाल अपनी प्रस्तुति देने अलग अलग जगह पहुंचते हैं और जिसे सामाजिक सद्भावना के तहत भी आयोजित किया जाता है जिसमें सभी लोग विभिन्न धर्म संप्रदाय के सहयोग भी करते हैं।
कोई भी धार्मिक आयोजन होता है तो सुरक्षा की दृष्टि से आयोजनकर्ता प्रशासन से अनुमति मांगता है उसके अनुमति मांगने का मकसद भी होता है कि आयोजित होने वाला कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से प्रशासन की निगरानी में संपन्न हो जाए और यह परंपरा आज की नहीं है बहुत पुरानी परंपरा है और ऐसे ही आयोजन होते हैं, प्रशासन और आयोजनकर्ता के सहयोग से बड़े से बड़े कार्यक्रम हुए हैं चाहे वह शासकीय कार्यक्रम हो या फिर सांस्कृतिक कार्यक्रम हो या फिर धार्मिक कार्यक्रम हो या फिर कोई भी खेलकूद के कार्यक्रम हो, इसमें प्रशासन की भूमिका सुरक्षा प्रदान करने की होती है पर यदि प्रशासन भी किसी कार्यक्रम के आयोजन को निरस्त करने का बहाना बनाएं तो क्या प्रशासन के लिए यह सोचा जाए कि हमारे जिले की प्रशासन योग्य नहीं है कि कोई भी धार्मिक आयोजन या फिर अन्य आयोजन वह करवा सके या फिर किसी एक धर्म विशेष का आयोजन उनके लिए बड़ा है या कहा जाए तो किसी राजनेता के प्रभाव में आकर ऐसे निर्णय लिए जा रहे हैं? तब क्या ऐसे प्रशासन व ऐसे जनप्रतिनिधियों से किसी धर्म विशेष को गिराना नहीं होगा, अब आप सोच रहे होंगे कि यह बात क्यों हो रही है तो यह बात इसलिए हो रही है क्योंकि 2 जून तारीख उर्स के समय सोनहत में मजार पर चादर चढ़ाने सहित कव्वाल का कार्यक्रम आयोजन करने की अनुमति के लिए 10 दिन पहले प्रशासन से अनुमति मांगी जा रही थी पर प्रशासन ने कार्यक्रम से दो दिन पहले आठ बिंदुओं का हवाला देते हुए कव्वाल कार्यक्रम को निरस्त करने को कहा और चादर कार्यक्रम आयोजित हो इस पर उन्होंने सहमति दे दी, जिसके बाद एक समाज विशेष का मनोबल टूट गया, वह इस धार्मिक कार्यक्रम को लेकर प्रशासन व जनप्रतिनिधि को कोस रहे हैं कि आखिर एक कार्यक्रम के लिए वह कई बहाने बनाकर आयोजित कार्यक्रम को उन्होंने निरस्त कर दिया है, यह जनप्रतिनिधि का षड्यंत्र माना जा रहा है पर सवाल यह उठता है कि क्या किसी धर्म को लेकर भी ऐसी गंदी राजनीति होनी चाहिए यदि हिंदू धर्म के भी कोई कार्यक्रम हो रहे हैं और वहां पर सिर्फ पूजा करने की अनुमति हो अन्य कार्यक्रम आयोजन करने की अनुमति प्रशासन क्या नहीं देगी एक बार फिर से यह मामला एक धर्म पर लेकर अटक गया है सवाल तमाम तरीके के हैं पर जवाब किसी के पास इस बात का नहीं है।
8 बिंदुओं का हवाला देकर अनुमति से किया इनकार?
आपको बता दे की प्रदेश भर में कई आयोजन अब तक आयोजित हो भी चुके वहीं कोरिया जिले के सोनहत विकासखंड अंतर्गत आयोजित होने वाले आयोजन को जिला प्रशासन ने स्थगित करा दिया और जिसका कारण भी काफी विचित्र बताया।बताया जा रहा है कि सुरक्षा कारणों का हवाला देकर आयोजन स्थगित करने आयोजन समिति को निर्देशित किया गया जिसके बाद अब आयोजन स्थगित किया जा चुका है, वैसे प्रदेश के विभिन्न जगहों पर यह शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो चुका है आयोजन ऐसे में कोरिया जिले में किन सुरक्षा कारणों का हवाला दिया गया यह समझ से परे है। वैसे जिन 8 बिंदुओं का हवाला दिया गया है कोरिया जिला प्रशासन द्वारा वह काफी हास्यास्पद है क्योंकि 8 बिंदुओं में जो समझाने का प्रयास किया गया है उसके अनुसार एक ही बात या तो कई बार बिंदु अनुसार दोहराई गई है या तो पुलिस बल की कमी बताई गई है, पहलगाम आतंकी हमले का जिक्र कई बार किया गया है जिसके बाद यह सवाल खड़ा होता है कि क्या ग्रामीण और दूरस्थ वन क्षेत्र में जिले के आयोजित होने वाले उर्स कार्यक्रम के वाकई आतंकी हमले का असर होगा आपसी सौहार्द बिगाड़ने लोग पहलगाम आतंकी हमले का सहारा लेंगे या उसको लेकर सौहार्द्र बिगाड़ने प्रयास करेंगे,वैसे बात केवल पुलिस बल की कमी की लिखी जाती तब भी बात समझ में आ जाती वैसे प्रशासन का यह कहना कि पुलिस बल की कमी है यह भी बात गले से उतरने वाली नहीं क्योंकि पुलिस बल की कमी अन्य जिलों से पूरी की जा सकती है रिजर्व बल भी बुलाया जा सकता है लेकिन बात चूंकि केवल उर्स आयोजन को रोकना है इसलिए अकारण को कारण लिखा गया यह 8 बिंदुओं से समझ में आ जाता है। आयोजन को लेकर जिला प्रशासन कोरिया ने जिन 8 बिंदुओं पर आयोजन की अनुमति स्थगित की है उसमें जो कारण बताए गए हैं वह इसलिए हास्यास्पद कहा जाएगा, क्योंकि शायद प्रशासन भी नहीं समझा पाया स्पष्ट रूप से की क्यों वह अनुमति नहीं देना चाहता है, कभी आयोजन स्थल स्टेडियम को छोटा बताया जा रहा है भगदड़ की आशंका जताई जा रही है कभी देर रात तक आयोजन होना और असामाजिक तत्वों के उपद्रव की बात की जा रही है, कभी पहलगाम आतंकी हमले से जोड़कर मनाही की गई है कभी स्टेडियम का रास्ता संकरा है यह बताया जा रहा है, कभी झिलमिली पाण्डवपारा के आंदोलन और बल की कमी की बात की गई है कभी फिर पहलगाम हमले से मामले को जोड़ा गया है, प्रशासन खुद स्पष्ट नहीं है कि वह क्यों आयोजन स्थगित कर रहा है।
सूफी संतों की पुण्यतिथि पर आयोजित होता है उर्स
उर्स का आयोजन सूफी संतों की पुण्यतिथि के अवसर पर किया जाता है, जो उनके स्वर्गवास की वर्षगांठ होती है, उर्स का आयोजन आमतौर पर संत की दरगाह या मकबरे पर किया जाता है, जो उनके अनुयायियों और भक्तों के लिए एक पवित्र स्थान होता है, उर्स के दौरान धार्मिक संगीत, जैसे कि हम्द, नात, और कव्वाली का गायन किया जाता है, उर्स के दौरान अक्सर एक बड़ा मेला भी लगता है, जिसमें दुकानें, भोजन स्टॉल, और मनोरंजन के साधन होते हैं, उर्स में बड़ी संख्या में अनुयायी और भक्त शामिल होते हैं, जो संत के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं, कव्वाली एक सूफी संगीत शैली है, जिसमें सूफी कविताओं को संगीत के साथ गाया जाता है, और उर्स के दौरान अक्सर कव्वालियों का आयोजन होता है, उर्स, सूफी संतों के प्रति श्रद्धा और प्रेम व्यक्त करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है, और यह सूफीवाद की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
क्या किसी राजनीतिक पार्टी के नेता की वजह से उर्स का कव्वाली कार्यक्रम हुआ रद्द?
सवाल यह भी उठ रहा है कि लंबे समय से चले आ रहे उर्स आयोजन को लेकर क्यों प्रशासन ने अनुमति नहीं दी,पहले ऐसा नहीं हुआ कि उर्स आयोजन को आतंकी हमले से और सद्भावना बिगड़ने से जोड़ा गया,पहली बार ऐसा हुआ है,क्या इसमें कोई राजनीतिक पार्टी मुख्य भूमिका में है,वैसे सवाल सहित जवाब की खोज आयोजकों को भी है,आयोजकों का कहना है कि यह आयोजन कभी ऐसे अकारण खड़े कारणों के कारण रद्द नहीं किए गए,प्रशासन भी ऐसे कारण दे रहा है जो हास्यास्पद हैं।
क्या प्रशासन किसी भी धार्मिक कार्यक्रम को सुरक्षा के बीच नहीं करा सकती संपन्न?
वैसे सोनहत उर्स कार्यक्रम को लेकर सुरक्षा हवाला प्रशासन ने दिया है,अब सवाल यह उठता है कि कोरिया जिला प्रशासन कोई भी धार्मिक आयोजन सुरक्षा कारणों से तत्काल स्थगित कर सकता है,क्या जिले में प्रशासनिक दृष्टिकोण से और सुरक्षा दृष्टिकोण से यह स्थिति बन रही है कि बल की कमी के कारण आगे अब कोई धार्मिक कार्यक्रम नहीं होंगे,सोनहत उर्स का कार्यक्रम स्थगित करना तो कम से कम यही बतला रहा है क्योंकि पूरा मामला सुरक्षा कारणों का बताया गया है जिसमें कारण भी ऐसे ऐसे दिए गए हैं जो शायद जिले की स्थिति और जिले के लोगों के व्यवहार से विपरीत हैं जहां कोरिया जिला शांतिपूर्ण और आपसी सद्भावना की पहचान रखता है वहां जिले में ही सद्भावना बिगड़ सकने की आशंका प्रशासन जता रहा है।
क्या उर्स कार्यक्रम को रद्द करने वाले अपने आप को ईश्वर से बड़ा समझ रहे हैं?
वैसे आस्था का साथ देना प्रशासन की जिम्मेदारी है,देश धर्मनिरपेक्ष है और सभी धर्म को धार्मिक आयोजनों की अनुमति मिलने का अधिकार है ऐसे में क्या अब जिला प्रशासन कोरिया खुद को भगवान और व्यवस्था से भी ऊपर मान रहा है और मना कर रहा है धार्मिक आयोजन के लिए।
बाबा भोलनशाह का मजार सर्व धर्म की एकता का प्रतीक
कोरिया जिले के सोनहत विकासखंड मुख्यालय में स्थित बाबा भोलनशाह का मजार सर्व धर्म की एकता का प्रतीक माना जाता है और यहां पर हमेशा सामाजिक सदभाव देखने को मिलता है। इस मजार पर लाखों लोग अपनी मनोकामना लेकर आते है और मनोकामना पूरी होने पर चादर और प्रसाद चढ़ाते है इस यह मजार रियासत काल के समय से ही विख्यात है इस मजार में आज भी पुरानी परंपराएं एवं रिवाज कायम है जो इस मजार के महत्व को और भी बढा देती है साथ ही देश प्रदेश स्तर पर स्थित समस्त मजारों से इस मजार को अनोखा बनाती है। यहां हर साल उर्स में चादर चढ़ाई जाती है। सोनहत क्षेत्र के ग्रामीणों के द्वारा मिल कर सदभावना गीतों के बीच चादर को पूरे नगर में घुमाया जाता है इसके बाद बाबा भोलनशाह के मजार पर चढ़ाया जाता है इसके बाद उर्ष कमेटी सोनहत बैकुंठपुर द्वारा अपना चादर चढ़ाया जाता है उर्स कार्यक्रम के तारतम्य में 2 जून को चादर पोषी का कार्यक्रम रखा गया था।
क्या है मजार का इतिहास
बाबा भोलनशाह के मजार का कोई प्रमाणिक इतिहास नहीं है लेकिन सोनहत के बड़े बुजुर्गों, मजार के मुजावर एवं पुजारियों के अलावा स्व. रामदेव यादव के परिवार के अनुसार इस मजार का इतिहास काफी ऐतिहासिक बताया जाता है। सोनहत में पुरातात्विक स्थलों के जानकारो अनुसार रियासत काल के समय जब राजा अमोल सिंह का शासन अंतिम समय में उसी समय से बाबा भोलनशाह की पूजा शुरू हुआ था और 1960 से 70 के आस पास मजार का निर्माण हुआ, शयामाधार यादव ने बताते हैं की उनके दादा राम देव यादव जो की बनारस से आए थे और अविभाजित सरगुजा जिले एवं वर्तमान में सोनहत और सुरजपुर जिले की सीमा पर स्थित ग्राम किरवाही में रह कर व्यापार किया करते थे। उनकी कोई औलाद नहीं थी और उन्होने उक्त स्थान पर पूजा अर्चना कर पुत्र रत्न की प्राप्ति की मन्नत मांगी जिसके बाद उन्हे पुत्र रत्न प्राप्त हुआ तदउपरांत उन्होने वहां पर यथा शक्ति मजार का निर्माण करवाया और उसके बाद से आज तक हर साल सालाना उर्स के मौके पर पहली चादर उनके परिवार से चढ़ाई जाती है उसके बाद कमेटी के द्वारा चादर चढ़ाया जाता है।
1970 में शुरू हुआ उर्ष
सोनहत निवासी स्व. आर यू पाण्डेय जो वन विभाग में पार्क परिक्षेत्राधिकारी के पद पर थे के द्वारा मजार पर मन्नत मांगी गई और उन्हे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई उसके उपलक्ष्य में उन्होने सोनहत एवं बैकुन्ठपुर के ग्रामीणों के साथ बाबा के माजार स्थल पर सालाना उत्सव मनाए जाने का निर्णय लिया और अपनी अगुवाई में सन 1970 में पहली बार सालाना उर्ष का कार्यक्रम शुरू करवाया जो आज पर्यन्त तक चालू है । धीरे धीरे समय बीतता गया और सुविधाएं बढ़ने लगी सन 1990 से 1995 के आस पास पुरानी मजार जिसे राम देव यादव ने बनवाया था उसका जीर्णोंधार कराकर नया मजार एवं कुआं समेत अन्य निर्माण कार्य कराया गया जो पहले से काफी भव्य था इस नव निर्माण में बैकुंठपुर से उर्स कमेटी, श्याम ट्रांसपोर्ट शिव श्कि्त ट्रांसपोर्ट के अलावा सोनहत के ग्रामीणों समेत सुरजपुर विश्रामपुर अंबिकापुर के व्यापारियों ने भी सहयोग किया इसके बाद सन 2010 के आस पास बैकुन्ठपुर कमेटी के तत्वाधान में मजार का पुनः विस्तार किया गया जिसमें मजार के अगल बगल और सजावटी कार्य कराए गए। जो पहले से काफी भव्य है।
जिस नियम के तहत प्रशासन ने कव्वाली की अनुमति नहीं दी इस नियम के तहत चादर कार्यक्रम को भी रद्द करने प्रशासन को सौंपा ज्ञापन
उर्स आयोजकों ने अब चादर चढ़ाने की अनुमति भी रद्द करने की मांग की है, उनका कहना है कि उर्स कार्यक्रम के दौरान होने वाली कव्वाली लंबे समय से जिले की पहचान रही है और यह सद्भावना का भी एक माध्यम है जब मुस्लिम धर्म के आयोजक अपने साथ हिंदू धर्म के लोगों के साथ आयोजन करते हैं जिसमें हिन्दू भी आयोजक समिति के सदस्य होते हैं,आयोजकों का कहना है जब सद्भावना कार्यक्रम को ही आतंकियों का खतरा है ऐसे में चादर भी चढ़ाने की अनुमति रद्द की जाए मुस्लिम समुदाय और आयोजक जिला प्रशासन के निर्णय से आहत हैं लेकिन वह अब चादर चढ़ाने नहीं जाना चाहते।
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