- सभी तरफ आने लगी हरियाली पर अभी भी उजाड है राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र
- जगह जगह लगी आग से अभी तक नही उबर पाया प्रदेश का सबसे बडा राष्ट्रीय उद्यान
- आग के बाद से कई जीव भी कर गए पलायन,बहुत कम दिखाई देते है जानवर

-राजन पाण्डेय-
कोरिया,10 मई 2025 (घटती-घटना)। मानसून आने को एक माह शेष है पतझड सामाप्त हो चुका है पेंडों पर नए पो भी आ चुके है महुए का सीजन खत्म हंआ अब सरई के पेंडों पर फूल आने की बारी है सोनहत क्षेत्र के जंगलों में हल्की बारिश होने के बाद अथवा शाम के समय पूरा जंगल सरई के पाों की भीनी भीनी प्राकृतिक खुशबू से भरा रहता है । लेकिन वही विकासखंड सोनहत स्थित गुरूघासीदास राष्ट्रीय उद्यान में स्थिती ठीक विपरीत है आलम है की एक से दो माह पुर्व जंगलों में लगी भीषण आग से कई जगहों पर राष्ट्रीय उद्यान वीरान एवं उजाड लग रहा है ऐसा लग रहा है मानों किसी ने उद्यान की सुदरता उससे छीन ली हो । वर्तमान समय में राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र के तुररी पानी परिक्षेत्र सोनहत,सहित मुख्य सड़क के अगल बगल के हिस्से पहाडि़यों पर भी आग के कारण जंगल जला हुआ दिखाई दे रहा है और अभी तक जंगल हरा भरा नही हो पाया है इसके अतिरिक्त अधिकांश जमीन जल कर काली हो गई है छोटे पौधे जल कर राख के हो गए है।
जानवरों ने भी किया पलायान
राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में भीषण आग के बाद यहां के जानवरों को यहां की आबो हवा राश नही आई अधिकांश जंगली जानवर भी पलायन कर चुके है। कुछ जानवर पानी के आभाव में पलायन कर गए और कुछ को आग की लपट एवं आग से जंगलों के विरानगी ने पलायन करने पर मजबूर कर दिया उल्लेखनीय है सोनहत से रामगढ जाने वाले रास्ते पर हिरण नीलगाय खरगोश मोर एवं छोटे बडे जानवरों का मिलना आम था लेकिन वर्तमान समय में चंद बंदरों के अलावा कुछ भी दिखाई नही देना राष्ट्रीय उद्यान के विकाश एवं वन्य प्राणी संरक्षण की दृष्टिी से बुरा संकेत माना जा सकता है।
प्रति वर्ष आग पर नियंत्रण नही
एक तरफ राष्ट्रीय उद्यान की नियमावली कहती है की उद्यान के अंदर माचिस एवं अग्नि सामग्री लेकर जाना प्रतिबंधित है लेकिन बावजूद इसके यहां प्रति वर्ष भीषण आग लग जाती है अब सवाल यह उठता है की इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा प्रशासन स्तर पर विभाग द्वारा आग लगने के बाद जांच बैठाई जाती है जांच रिपोर्ट महज कागजों तक सिमित रह जाती है और किसी भी कर्मचारी के उपर कोई कार्रवाई नही होती। और नुकसान सिर्फ राष्ट्रीय उद्यान एवं उसमें निवास करने वाले जानवरों को उठाना पडता है ।
लाखों का आबंटन
प्रति वर्ष शासन से विभाग को राष्ट्रीय उद्यान की आग से सुरक्षा एवं वन्य प्राणी संरक्षण हेतू लाखों रूपए की राशी प्राप्त होती है लेकिन बावजूद इसके जानवर पलायन कर रहे है । आखिर इस राशी का उपयोग कहां होता है और यदि होता है तो इसके सकारात्मक परिणाम क्यूं नही आते यह तथ्य समझ से परे है।
प्रतिदिन पशुचारण
उद्यान के अंदर जहां अनाधिकृत व्यक्तियों का प्रवेश वर्जित है वही उद्यान परिसर में ग्रामीणों द्वारा प्रतिदिन पशुचारण कराया जा रहा है। जिससे छोटे-छोटे पौधे खत्म होते जा रहे है,इसकी जानकारी विभाग को भी है परन्तु विभाग द्वारा अभी तक कोई कार्यवाही नही की गई है। इसके अतिरिक्त पार्क परिक्षेत्र के कई अधिकारी अधिकांशतः मुख्यालय से नदारत रहते है साथ ही विभागीय कर्मचारी भी अक्सर अपने क्षेत्र से नदारत पाये जाते है। ऐसे मे उद्यान की सुरक्षा भगवान भरोसे रहती है जिसका फायदा तस्करों द्वारा बखूबी उठा लिया जाता है।
टाईगर प्रोजेक्ट पर सवाल
गुरूघासी दास राष्ट्रीय उद्यान में विभागिय स्तर पर अनियमितताए खत्म होने का नाम ही नही ले रही है एसी स्थिती में टाइगर परियोजना को लेकर जहां लोगों में खुशी है वही टाइगर परियोजना की कामयाबी पर अभी से प्रश्न चिन्ह लगता नजर आ रहा है सोनहत क्षेत्र के गा्रमीणों ने जानकारी देते हुए बताया की राष्ट्रीय उद्यान में अवैघ रूप से गिटटी एवं रेत उत्खनन करने का कार्य जोरे से प्रगति रत है और इन्हें विभाग के कामो में ही खपाया जाता है और विभागिय कर्मचारी जान कर भी अनजान बने हुए है इसके अतिरिक्त जहां एक ओर से औद्यौगिकीकरण एवं शहरीकरण के कारण वनों का विनाश एवं कटाई तीव्र गति से होता जा रहा है,वही वनो का विनाश के साथ-साथ वन्य जीवों पर भी इसका प्रतिकूल असर पडता जा रहा है। उद्यान के अंतर्गत जीव प्रजातियां निरन्तर कम होती जा रही है, जो कि घोर चिन्ता का द्योतक है। वही प्रशासन द्वारा इस संबंध में सार्थक पहल के नाम पर मात्र खानपूर्ती की जा रही है।
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