महिला अफसर को दी धमकी
रायपुर,08 अप्रैल 2025 (ए)। न्यायिक आदेश की खुली अवहेलना और पुलिस प्रशासन के कार्य में सुनियोजित बाधा का सनसनीखेज मामला राजधानी रायपुर में सामने आया है। अपराध क्रमांक 182/25 के तहत आरोपित व्यक्ति के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की धारा 296, 115(2),351(2) के तहत प्रकरण दर्ज है, और एसडीएम न्यायालय से जेल वारंट भी विधिवत रूप से जारी किया जा चुका था। पुलिस जब आरोपी को जेल दाखिल कराने ले जा रही थी, तब कुछ अधिवक्ताओं द्वारा लगभग पौन घंटे तक पुलिस बल को घेर कर आरोपी को जेल दाखिला नहीं करने दिया गया। अधिवक्ताओं और आरोपी के परिजनों द्वारा बार-बार कहा गया देखते हैं अब कैसे लेकर जाते हो, जेल नहीं जाने देंगे।
इस बीच,जब तेलीबांधा थाना की एक महिला पुलिस अधिकारी ने स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास करते हुए एक अधिवक्ता से उसका नाम पूछते हुए कहा,मैं माननीय जिला एवं सत्र न्यायाधीश महोदय को आपके नाम से शिकायत करुंगी, कृपया अपना नाम बता दीजिए,तब अधिवक्ता ने घमंडपूर्वक उत्तर दिया-नाम जानकर क्या करोगी? कल तो वैसे भी पता चल जाएगा। यह संवाद न केवल अभद्रता की पराकाष्ठा है,बल्कि यह दर्शाता है कि किस प्रकार से कुछ अधिवक्ता न्यायालय के आदेशों को चुनौती देते हुए कानून से ऊपर होने का दावा करते हैं। इस पूरे घटनाक्रम में अधिवक्ताओं द्वारा किया गया व्यवहार भारतीय न्याय संहिता की धारा 228 (न्यायालय की कार्यवाही का अपमान), धारा 186 (लोक सेवक के कार्य में बाधा), तथा धारा 353 (लोक सेवक पर हमला या आपराधिक बल प्रयोग) के अंतर्गत स्पष्ट रूप से दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है। जेल वारंट को अधिवक्ताओं द्वारा जबरन छीनकर उसे फाड़ने का प्रयास किया गया, जो सीधे-सीधे न्यायालय के आदेश का घोर अपमान है। मौके पर वीडियो बनाकर पुलिस अधिकारियों को डराने, धमकाने और आरोपी के परिजनों को उकसाने जैसे कृत्य अब सामने आए वीडियो फुटेज में स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। फिर भी लगभग पौन घंटे की कड़ी मशक्कत और वरिष्ठ अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद पुलिस ने आरोपी को जेल दाखिल कराया।
विडंबना यह है कि इस पूरे घटनाक्रम के बाद आज अधिवक्ताओं द्वारा वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कार्यालय का घेराव कर, उपरोक्त महिला अधिकारी को लाइन अटैच करवा दिया गया। लेकिन स्वयं अधिवक्ताओं की घोर अनुशासनहीनता और कानूनी मर्यादा भंग करने वाली गतिविधियों को लेकर कोई आत्मावलोकन नहीं किया गया। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या अधिवक्ता अब कानून से ऊपर हो गए हैं? क्या न्यायालय के आदेशों का पालन करवाना अपराध बन चुका है? क्या महिला अधिकारी को कर्तव्यनिष्ठा की सजा दी जा रही है? और सबसे गंभीर बात यह कि जब अधिवक्ताओं द्वारा ही पुलिस को दबाने का प्रयास किया जाएगा, तब आखिर कौन सही और कौन गलत यह समाज के लिए सोचने और देखने का विषय बन गया है। यदि इस पूरे प्रकरण में कानून सम्मत कठोर कार्यवाही नहीं की गई, तो यह स्थिति देशभर में न्यायिक प्रक्रिया के लिए एक खतरनाक मिसाल बन जाएगी। संविधान और न्यायपालिका के आदेशों का पालन हर नागरिक का कर्तव्य है अधिवक्ताओं को भी इसका अपवाद नहीं बनाया जा सकता।
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