-विशेष संवाददाता-
बैकुण्ठपुर,14 सितम्बर 2024 (घटती-घटना)। हमारे लोकतंत्र की खूबसूरती और कमियां दोनों हैं बस अपने-अपने नजरिए से सोचने व समझने की आजादी भी है, आज के परिवेश में यदि देखा जाए तो जनता नेता चुनती है और उस नेता के सामने प्रशासनिक से लेकर पुलिस के लोग माथा टेकते हैं पर वही जनता जो नेता चुनती है उसके सामने कोई माथा नहीं टेकता, माथा सिर्फ टेकता भी है तो 5 साल में एक बार वह भी उस समय जब चुनाव आता है और उन्हें कुर्सी चाहिए होती है, मंत्री विधायक बनना होता है मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री बनना होता है उसके बाद फिर 5 साल वही जानता दर-दर की ठोकरो के बीच 5 साल बिताती है,जबकि आम लोगों को उनके पास अपने कार्य करवाने के लिए जाने पर परेशानियों का सामना करना पड़ता है, यह आज के परिवेश की स्थिति है जिसे जनता चुनकर लाती है उससे वह अपना काम आसानी से नहीं करवा पाती, क्योंकि नेता या जनप्रतिनिधि या कहे तो निर्वाचित जनप्रतिनिधि जिन्हे संविधान में विधायिका भी कहा जाता है जो लोकतंत्र का तीसरा स्तंभ है तीसरा स्तंभ कहलाने की आजादी हमारे संविधान ने दी है, विडंबना वहां पर हो रही है जहां पर निर्वाचित होने वाले जनप्रतिनिधि सरकार के विधायक मंत्री कुछ की गिरफ्त में ही पूरी दुनिया को देख रहे हैं पर वह भीड़ या फिर वह लोग जो अप्रत्यक्ष रूप से आपको उस काबिल बनाए उसके लिए सोचने वाला शायद कोई नहीं? स्वार्थी किस्म के नेता जो राजा समझ रहे हैं खुद को वह कहीं ना कहीं घमंड में लबरेज हैं।
आज जो प्रायः देखने को मिलता है उसके अनुसार यह देखा जाता है की आम जनता का महत्व केवल उन दिनों ही देखने को मिलता है जब चुनाव का समय होता है, चुनाव के बाद जनता केवल जनप्रतिनिधियों के चक्कर ही लगाती रहती है और वह पूरे पांच साल इस उम्मीद के साथ जनप्रतिनिधियों के चक्कर लगाती है की उसका कुछ भला जरूर होगा लेकिन ऐसा हर बार नहीं होता न ही सभी का होता है। ज्यादातर मामले में यह भी देखा गया है की निर्वाचित होने वाले जनप्रतिनिधि अपनी ही जनता से दूर हो जाते हैं वहीं प्रशासनिक अधिकारी कर्मचारी और पुलिस अधिकारी कर्मचारी भी नेताओ के प्रति जनप्रतिनिधियों के प्रति तो सम्मान का भाव रखते हैं लेकिन वह आम जनता के प्रति वह भाव नहीं रख पाते। आम लोग प्रशासनिक अधिकारियों सहित कर्मचारियों एवम पुलिस अधिकारियों एवम कर्मचारियों के लिए आम ही होते हैं और एक तरह से वह गाहे बगाहे तिरस्कृत ही होते रहते हैं। जनप्रतिनिधियों का ध्यान इस ओर जाना तो चाहिए लेकिन उनका ध्यान निर्वाचित होने उपरांत इस ओर कम ही जाता है और आम जनता जो निर्वाचक होती है जनप्रतिनिधियों की वह अपना सम्मान ही ढूंढती रह जाती है। आज के परिवेश में सम्मान जनप्रतिनिधियों के प्रति ही प्रशासनिक अधिकारियों कर्मचारियों सहित पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों का रह गया है आम लोगों के लिए वह कोई विचार नहीं कर रहे हैं यह देखा जा रहा है।
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