- जलवायु परिवर्तन का असर वर्तमान मौसम में हो रहा परिलक्षित
- पर्यावरण चक्र से विलग 2 माह पूर्व ही होने लगा परिवर्तन
- इस वर्ष कड़ाके की ठंड का नहीं दिखा असर, ना पाला पड़ा,ना शीतलहर चली
- गर्मी का एहसास अभी से, भीषण गर्मी पड़ सकती है 2023 में
- जलवायु में अप्रत्याशित परिवर्तन देश के लिए चिंताजनक
- इस वर्ष ठंड वैसे नहीं पड़ी पर गर्मी का एहसास अभी से ही, 2023 में भीषण गर्मी पड़ने का अनुमान?
- जलवायु परिवर्तन से 2023 किसानों से लेकर आम लोगों के लिए चिंताजनक हो सकता है
- ऋतु के साथ समय का चक्र बिगड़ा सब कुछ ऋतु से पहले हो रहा क्यों?

–रवि सिंह-
बैकुण्ठपुर 29 दिसम्बर 2022 (घटती-घटना)। परिवर्तन प्रकृति का नियम है परिवर्तन चाहे किसी भी प्रकार का हो, नया दौर आने पर असहज महसूस होता है। परिवर्तन को सहजता से स्वीकार करना कठिन कार्य है और परिवर्तन अनुसार ढलने में वक्त लगता है। किसी भी प्रकार का परिवर्तन यदि अल्प हो तो उसका व्यापक असर नहीं होता। परंतु जब परिवर्तन ही सार्वभौमिक हो तो प्रभाव भी सार्वभौमिक हो जाता है। सभ्य समाज के निर्माण के? लिये प्रगति और विकास की होड़, आपसी प्रतिस्पर्धा, आधुनिकीकरण, भौतिक सुख-सुविधाओं हेतु उन्नत तकनीकों का विकास क्रम, भौतिकवादी जीवन शैली, नित नए अविष्कार के अनुक्रम में मानव प्रजाति को जहां एक ओर संवेदना विहीन करने का कार्य किया। तो वहीं धरती आकाश और पाताल तक होने वाले मानवीय हस्तक्षेप ने प्राकृतिक तौर पर एक असंतुलन पैदा कर दिया है। जिसका असर गाहे-बगाहे प्रकृति दिखा जाती है। परंतु आधुनिक मानव का चेतना विहीन मस्तिष्क अभी भी इन प्राकृतिक संकेतों को समझ नहीं पा रहा। भूकंप, बाढ़, ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्री क्षेत्रों का विस्तार, थल क्षेत्र का जलीय अतिक्रमण, भूस्खलन, बेमौसम मूसलाधार बारिश यह सब प्रकृति के ऐसे संकेत हैं, जो मानव प्रजाति को जलवायु परिवर्तन और ऋतु चक्र परिवर्तन के प्रति आगाह कर रहे हैं। मानवीय कृत्यों का ही परिणाम है कि मौसम अनुसार कोई भी प्राकृतिक घटनाक्रम घटित नहीं हो रही है। ऋतुओ के अनुसार बारिश का ना होना, ठंड का बेअसर होना, बेमौसम गर्मी का एहसास होना गंभीर चिंता का विषय है।
समय से पहले पतझड़ व आम के पेड़ में आए बौर क्या अच्छे संकेत नहीं?
सामान्यतः बसंत ऋतु तक आने वाला पतझड़ और वार्षिक आम की फसलों में लगने वाले बौर इस बार शीत ऋतु में ही देखने को मिल रहा है, जो कि अच्छे संकेत नहीं है। मौसम के अनुसार आम के वृक्षों में फूल का आना और पतझड़ का मौसम बसंत ऋतु के आसपास का होता है, परंतु बसंत ऋतु के डेढ़ से 2 माह पूर्व ही इस प्रकार की घटनाएं भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं है। गर्मी का एहसास अभी से होने लगा है। दिन में तेज हवाएं चल रही हैं, यह सब पर्यावरण असंतुलन का परिणाम है। अगर इक्का-दुक्का स्थानों पर ही ऐसे परिवर्तन देखने को मिलते, तो यह गंभीर बात नहीं थी। परंतु अधिकांश स्थानों पर यह परिवर्तन परिलक्षित हो रहा है। यह परिवर्तन तात्कालिक नहीं अपितु दीर्घकालिक मानवीय कृत्यों का परिणाम है, जिसे संस्था से स्वीकार करना मानव के वश में नहीं होगा।
पर्याप्त ठंड न पड़ने की वजह से रबी की फसलों को हो सकता है नुकसान
रबी सीजन की फसल जैसे गेहूं, सरसों जिनके लिए पर्याप्त ठंड की आवश्यकता होती है, इस बार बारिश की देरी की वजह से धान की फसल भी देर से हुई, तत्पश्चात गेहूं, सरसों की बुवाई में समय लग गया। अब हालात यह है कि फसल अपनी प्रारंभिक दौर में है, और ठंड का असर शनै-शनै ग्रीष्म की ओर बढ़ रहा है। इन परिस्थितियों में धरती के ऊपर की नमी का गर्मी और हवा की बयार की वजह से बार बार सूख जाना इन फसलों के लिए नुकसानदेह है।
जहां एक ओर इन फसलो को पर्याप्त ठंड की आवश्यकता पड़ती है। वहीं बेअसर दिख रहे ठंड के कारण किसानों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। पहले बारिश ने किसानों को खूब सताया, अब रबि की फसल के लिए अनुकूल मौसम ना होने के कारण किसान फिर से ठगे रह जाएंगे।
मनुष्य का विकास क्रम, पर्यावरण और दोहन स्वरूप उपजी अनियमितताएं ही विकास से विनाश की ओर का कदम है
मनुष्य की प्रकृति पर निर्भरता आदि काल से ही चली आ रही है। इसीलिए विश्व की प्रत्येक सभ्यता में प्रकृति की पूजा का प्रावधान है। प्राचीन भारतीय समाज भी प्रकृति के प्रति बहुत ही जागरूक था। वैदिक काल में प्रकृति के विभिन्न अंगों भूमि, पर्वत, वृक्ष, नदी, जीव-जन्तु आदि की पूजा की जाती थी। प्रकृति के प्रति मनुष्य की इस असीम श्रद्धा के कारण पर्यावरण स्वतः सुरक्षित था । विकास की अंधी दौड में मनुष्य ने प्रकृति को अत्यधिक नुकसान पहुँचाना शुरू कर दिया । एक सीमा तक प्रकृति उस नुकसान की भरपाई स्वयं कर सकती थी, लेकिन जब उसकी स्वतः पूर्ति की सीमा समाप्त हो गई तो पर्यावरण असंतुलित हो गया। आज का मनुष्य लालच के वशीभूत होकर प्रकृति का दोहन कर रहा है। इसकी अति-उपभोगवादी प्रवृत्ति के कारण प्रकृति को इतना नुकसान पहुँच चुका है कि प्रकृति की मूल संरचना ही विकृत हो गई है। अगर हम यह विचार करें कि जिस प्रकृति की मनुष्य पूजा करता था, वह उसके प्रति इतना क्रूर कैसे हो गया। इसके उत्तर में हम देखेंगे कि समय के साथ मनुष्य की सोच में परिवर्तन आ गया है। प्रकृति के साथ सहजीवन व सह-अस्तित्व की बात करने वाला मनुष्य कालान्तर में यह सोचने लगा कि यह पृथ्वी केवल उसके लिए ही है; वह इस पर जैसे चाहे वैसे रहे।अपनी इस नवीन सोच के कारण वह प्रकृति को पूजा व सम्मान की नहीं अपितु उपभोग की एक वस्तु के रूप में देखने लगा। उसके विचारो में आया यह परिवर्तन ही पर्यावरण असंतुलन का आधार तैया किया । पर्यावरण के असंतुलन के लिए अनेक कारण उत्तरदायी हैं । लेकिन वे सभी कही न कहीं हमारी अनियोजित व अदूरदर्शी अर्थनीति से जुड़े हुये हैं ।
मनुष्य अपनी आर्थिक उन्नति के लिए ”कोई भी कीमत” देने को तैयार है
आज का मनुष्य अपनी आर्थिक उन्नति के लिए ”कोई भी कीमत” देने को तैयार है। उस ”कोई भी कीमत” की सबसे बडी कीमत प्रकृति को ही देनी पड़ती है। भारी औद्योगीकरण आज विकास का पर्यायवाची बन गया है । इन बड़े उद्योगों की स्थापना से लेकर इनके संचालन तक प्रत्येक स्तर पर पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है । इन औद्योगिक इकाइयों के निर्माण के लिए वनों की कटाई की जाती है। उत्पादन के प्रक्रम में इनसे विभिन्न हानिकारक अपशिष्टों का उत्सर्जन होता है। ये पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले सबसे प्रमुख कारक हैं। परिवहन के विकास एक ने खनिज तेलों उपभोग को बहुत बढ़ा दिया है। इनके ज्वलन से SO2, CO2, CO आदि जैसी हानिकरण गैसें निकलती है जो वायु प्रदूषण को फैला रही हैं। कृषि में भी रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशको का उपयोग बढता जा रहा है। ये सब तात्कालिक रूप से लाभप्रद दिखते हैं। लेकिन दीर्घकाल में इनके दुष्परिणाम बहुत ही भयानक होते हैं । इसी प्रकार अन्य विकासात्मक कार्य जैसे-सड़क निर्माण बाँध रेलवे खनन आदि भी पर्यावरणीय नुकसान में अपना योगदान करते हैं साथ ही कुछ परम्परागत कारण, जैसे- वनों का दोहन, अवैध कटाई आदि, भी पर्यावरण संतुलन को बिगाडते हैं। वर्तमान में आर्थिक विकास की होड़ में विश्व के सभी राष्ट्र अपने औद्योगिक विकास को हर कीमत पर जारी रखना चाहते हैं, इसके लिए वे पर्यावरण के लिए अपनी जिम्मेदारियों की उपेक्षा करने लगे हैं।
विकसित राष्ट्र अपने दायित्वों को स्वीकार न करते हुये सारा दोष विकासशील राष्ट्रों पर डाल देते हैं
विकसित राष्ट्र अपने दायित्वों को स्वीकार न करते हुये सारा दोष विकासशील राष्ट्रों पर डाल देते हैं। वहीं विकासशील देश अपनी विकास की मजबूरियों का हवाला देते है। इन कारणों से पर्यावरण संरक्षण के लिए अन्तर्राष्ट्रीय चिन्ताएँ तो व्यक्त की जाती हैं लेकिन कोई ठोस पहल नहीं हो पाती है। यहाँ यह समझने की आवश्यकता है कि मनुष्य को पर्यावरण की रक्षा के लिए अपनी विकासात्मक गतिविधियों को रोकना जरूरी नहीं है । लेकिन इतना जरूर है कि हमें पर्यावरण की कीमत पर विकास नहीं करना चाहिए क्योंकि विकास से अभिप्राय समग्र विकास होता है केवल आर्थिक उन्नति नहीं। यदि हम मात्र इतना ध्यान रखे कि ये पेड-पौधे नदिया-तालाब. वन्य-जीव हमसे पिछली पीढ़ी ने हम तक सुरक्षित पहुँचाया है।
विकास के नाम पर पर्यावरण को होने वाली क्षति समाप्त हो जायेगी
हमारा दायित्व है कि हम इसे अपनी आने वाली पीढी तक सुरक्षित पहुँचाये। केवल इतना करने से ही विकास के नाम पर पर्यावरण को होने वाली क्षति समाप्त हो जायेगी। यही सतत विकास की संकल्पना का आधार है। पिछले कुछ दशकों से पर्यावरण असंतुलन की स्थिति बहुत ही भयावह हो गई है । प्रकृति के साथ सदियों से चली आ रही कुरता के दुष्परिणाम अब सामने आने लगे हैं। ग्लेशियरों का पिघलना, अरब के रेगिस्तानों में भारी वर्षा, ओजोन परत में छिद्र, बाढ, भूकम्प, अम्ल वर्षा, सदानीरा नदियों का सूखना फसल चक्र का प्रभावित होना जैव-विविधता में तीव्र गति से हास होना आदि असंतुलित पर्यावरण की ही अभिव्यक्ति है।
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